Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
रसहुँ सरस रस प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
Reading 99 of 112 · Source no. 87 · Source PDF 183–184
1रसहुँ सरस रस प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
2कहत “रसो वै सः” श्रुति चारी,
3रस स्वरूप बनवारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
4सोई भिक्षुक बनि बनवारी,
5चह ब्रज रस ढिग प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
6लिय अगनित अवतार मुरारी,
7रहे असुर संहारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
8ब्रज रस पाय रसिक बनवारी,
9बनि गये रासबिहारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
10लह्यो रास-रस तब बनवारी,
11कियो कृपा जब प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
12राधे नाम जपत बनवारी,
13ध्यावत छवि नित प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
14श्रुति कह शक्तिमान बनवारी,
15शक्ति ह्लादिनी प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
16महाभावरूपिणि सुकुमारी,
17मादनाख्य रति वारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
18मादन रस न पाव बनवारी,
19याते अनुगत प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।
20रस को दे “कृपालु” रस प्यारी,
21बलिहारी बलिहारी, प्यारी प्यारी प्यारी॥
22भावार्थ—रस-स्वरूप श्रीकृष्ण से भी अधिक रसमयी श्रीराधा
23हैं। चारों वेद ब्रह्म श्रीकृष्ण को रस स्वरूप बताते हैं। वे ही रस-
24स्वरूप श्रीकृष्ण भिखारी बनकर श्रीराधा के निकट ब्रजरस की याचना
25करते हैं। असंख्य अवतार धारण कर श्रीकृष्ण ने केवल राक्षसों का
26नाश ही किया। श्रीराधा से ब्रजरस प्राप्त कर वे रास-बिहारी की
27उपाधि से विभूषित हो गये। यह रास-रस श्रीकृष्ण को तब ही प्राप्त
28हुआ जब उन पर श्रीराधा की कृपा हुई। श्रीकृष्ण निरन्तर श्रीराधा
29के नाम का जप करते हैं एवं राधा की ही छवि का ध्यान करते हैं।
30वेद कहता है कि श्रीकृष्ण शक्तिमान हैं। उन्हीं की ह्लादिनी शक्ति
31श्रीराधा हैं। श्रीराधा मादन महाभाव की अधिष्ठात्री हैं। श्रीकृष्ण को
32मादन रस प्राप्त नहीं है, इसीलिए वे सदा राधा के अनुचर बने रहते
33हैं। “कृपालुजी” कहते हैं कि रस रूप कृष्ण को रस प्रदान करने
34वाली राधा पर मैं बलिहार जाता हूँ।