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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

राधे राधे राधे राधे राधे राधे

Reading 89 of 112 · Source no. 77 · Source PDF 158–160

1राधे राधे राधे राधे राधे राधे

2राधे राधे राधे राधे राधे राधे

3भुक्ति मुक्ति ना दे राधे प्रेम सुधा दे।

4निज दासी दासी दासी दासी बना दे।

5राधे निज महल की टहल दिला दे।

6ब्रज रस की इक बूँद पिला दे।

7काउ गोपी ते गोपी प्रेम दिला दे।

8तेरा नाम लै के रोऊँ ऐसी बना दे।

9तेरा गुन गाऊँ नित ऐसी बना दे।

10तेरी छवि ध्याऊँ नित ऐसी बना दे।

11निज रुचि महँ रुचि मेरी बना दे।

12जित देखूँ तू ही दीखे ऐसी बना दे।

13तेरे बिनु जीऊँ नहिं ऐसी बना दे।

14बरसाने वारी भोरी भारी प्यारी राधे।

15श्री वृषभानुदुलारी प्यारी राधे।

16भली हूँ बुरी हूँ जो हूँ तेरी ही हूँ राधे।

17नथ बेसर वारी प्यारी राधे।

18ऊँचे महल अटा वारी राधे।

19तू ही इक मेरी थी है रहेगी भी राधे।

20मैं ना भूलूँ तोहिं तू ना भूल मोहिं राधे।

21माना मैं बुरी हूँ अति हूँ तो तेरी राधे।

22मेरी तो है तू ही गति मति रति राधे।

23पतितन और ठौर हो तो बता दे।

24होत कुपूत पूत जग राधे।

25माता भी कुमाता कोउ भइ हो बता दे।

26रसिक रँगीली गुन गर्वीली राधे।

27ब्रज रस बरसाने वारी प्यारी राधे।

28तेरे सब खरे-खरे सेवक राधे।

29मुझ खोटी को खरों के संग चला दे।

30अच्छों की तो पूजा होय बुरों ते ही राधे।

31कोउ हो “कृपालु” मोसों बुरा तो बता दे।

32भावार्थ—हे श्री राधे! मैं आपसे ब्रह्मलोक पर्यन्त के नाशवान

33सुख एवं पाँचों प्रकार की मुक्तियों की कामना नहीं करता। मैं तो

34केवल निष्काम प्रेम ही चाहता हूँ। अपनी दासी की दासी की दासी

35की दासी ही मुझे बना दीजिए। श्रीराधे! मुझे अपने निज महल की

36सेवा प्रदान करना। ब्रज-रस का एक बिन्दु ही मुझे प्रदान करना।

37तुम किसी गोपी से मुझे गोपी-प्रेम दिला देना। मैं तुम्हारा नाम

38लेकर आँसू बहाया करूँ; मुझे ऐसा कब बनाओगी? निरन्तर तुम्हारा

39ही गुण-गान करती रहूँ। तुम्हारी छवि को ही हृदय में धारण कर

40लूँ। हे राधे! तुम अपनी रुचि में ही मेरी रुचि बना दो। मैं जिधर भी

41दृष्टि डालूँ तुम्हें ही देखूँ। तुम्हारे बिना मेरा जीवन, जीवन न रहे।

42हे बरसाना धाम में निवास करने वाली वृषभानुनन्दिनी! मैं अच्छा

43हूँ अथवा बुरा हूँ, जैसा भी हूँ तुम्हारा ही तो हूँ। नासिका में नथ

44एवं बुलाक धारण करने वाली ऊँचे महलों में रहने वाली राधे!

45एकमात्र तुम ही मेरी थी, हो एवं सदा रहोगी। मैं तुम्हें कभी न

46भूलूँ और तुम भी मुझे कभी न भूलो। यद्यपि मैं जानता हूँ कि मैं

47अत्यन्त बुरा हूँ किन्तु हूँ तो तुम्हारा ही। राधे! मेरी तो गति तुम

48तक ही सीमित है। तुम ही मेरी बुद्धि को प्रेरित करने वाली हो

49तथा तुम ही मुझे श्रीकृष्ण विषयक रति प्रदान करोगी। तुम्हें छोड़कर

50यदि पतित-जनों के लिये कहीं अन्यत्र स्थान हो तो तुम्हीं बता

51दो। जगत् में कुपुत्र तो देखे गये हैं किंतु माता तो कुमाता नहीं

52होती। हे रसिक-शेखर के प्रेम-रंग में रंगी हुई, दिव्य-गुण-गणों

53के कारण गर्वीली बनी हुई राधे! तुम ब्रजरस की वर्षा करने वाली

54हो। तुम्हारी सेवा करने वाले सभी भक्त-जन तो अत्यन्त गुणवान

55हैं। मुझ गुणहीन को भी उनके मध्य स्थान दे दो। राधे! यदि बुरे न

56हों तो अच्छों का सम्मान कौन करेगा? हे “कृपालु” मुझसे बुरा

57तुम्हें कहीं भी प्राप्त नहीं होगा।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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