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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

ऊधो कहु नंद कुमार, हम सब भोरी ब्रजनार,

Reading 61 of 112 · Source no. 49 · Source PDF 107–109

1ऊधो कहु नंद कुमार, हम सब भोरी ब्रजनार,

2मम सँग किय रास बिहार, मम सँग रह मम भरतार।

3मम रोम रोम मम यार, मम नैनन नंदकुमार,

4हम लख पियमय संसार, मम सँग रह मम भरतार।

5हम चाहत वाय बिसार, बिसरत नहिं हम गइँ हार,

6कहु कछु याको उपचार, सँग तजत नाहिं भरतार।

7वे मथुरा करहिं बिहार, रह सुखी सदा सरकार,

8नहिं चह हम कछु ब्रजनार, मम सँग रह मम भरतार।

9हम ब्रज रस पीवन हार, तव नीरस योग विचार,

10हम प्रेम योग उर धार, मम सँग रह मम भरतार।

11ऊधो दो योग बिसार, गहु तुमहुँ शरण ब्रजनार,

12लहु प्रेम सुधा रस सार, लो मत “कृपालु” उर धार।

13भावार्थ—ब्रजगोपियाँ उद्धव से कहती हैं-हे उद्धव! अपने

14मित्र श्रीकृष्ण से जाकर कहना कि हम सब ब्रजांगनायें अत्यन्त ही

15भोली-भाली हैं। मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण, जिन्होंने वृन्दावन में अनेक

16रात्रियाँ मेरे साथ रास-विलास में व्यतीत की थीं-वे सदैव ही मेरे

17साथ रहते हैं। मेरे रोम-रोम में मेरा प्रियतम रमा हुआ है। मेरे नेत्रों

18में नंदनंदन निवास करते हैं। हम ब्रजगोपियों को सम्पूर्ण संसार ही

19अपने प्रियतम से परिपूर्ण दिखाई देता है। मेरा सहचर कृष्ण तो

20प्रतिपल मेरे साथ ही रहता है। हे उद्धव! यद्यपि हम गोपियाँ चाहती

21हैं कि कुछ काल के लिये श्रीकृष्ण को भुला दें परन्तु वह हमें एक

22क्षण को भी नहीं भूलते। यह हमारी विवशता है। उद्धव! क्या

23तुम्हारे पास कोई ऐसा उपाय है जिससे हम श्यामसुन्दर को भुला

24दें? वे तो एक क्षण को भी हमारा साथ नहीं छोड़ते। वे भले ही

25सदैव मथुरा की स्त्रियों के साथ विहार करते रहें। हमें तो उनके

26सुख से ही सुख की अनुभूति होती है। हमें उनसे किसी प्रकार की

27अपेक्षा नहीं है। हमारा प्रियतम तो नित्य ही हमारे साथ है। हम

28ब्रज-गोपियाँ ब्रजरस की ही लालसा रखती हैं। जिस योग मार्ग का

29उपदेश तुमने हमें दिया है, वह तो अत्यन्त ही शुष्क है। हमने तो

30हृदय में श्रीकृष्ण के प्रेम को ही धारण किया है। श्री कृपालुजी

31कहते हैं- हे उद्धव! हम तुम्हें तुम्हारे हित की बात बताते हैं-तुम

32भी योग मार्ग को त्यागकर ब्रजदेवियों के शरणागत होकर उनसे

33प्रेमामृत के सार को ग्रहण कर लो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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