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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

बलिहार ब्रजेन्द्र कुमार, तव अस्तुति कर श्रुति चार।

Reading 58 of 112 · Source no. 46 · Source PDF 101–103

1बलिहार ब्रजेन्द्र कुमार, तव अस्तुति कर श्रुति चार।

2मानी विधि हरि हर हार, तव महिमा अपरंपार॥

3तू पूर्ण ब्रह्म साकार, तू चित सुख घन तन धार।

4तू दिव्य प्रेम अवतार, तव महिमा अपरंपार॥

5तू सब जग सर्जन हार, तू सब जग पालन हार।

6तू ही कर जग संहार, तव महिमा अपरंपार॥

7तू त्रिभुवन मोहन हार, तू मदनहुँ मोहन हार।

8तू निज मन मोहन हार, तव महिमा अपरंपार॥

9तू दीनन को रखवार, तू पतितन की पतवार।

10तू निराधार आधार, तव महिमा अपरंपार॥

11तू भक्त वश्य सरकार, तू व्यापक जगत मझार।

12तू अग जग प्राणाधार, तव महिमा अपरंपार॥

13तू प्रेम सुधा रस सार, तू करुणा को भंडार।

14तू ब्रज वनितनि रिझवार, तव महिमा अपरंपार॥

15तू शरणागत रखवार, तू सब उर जाननि हार।

16तू ब्रज रस सिंधु अपार, तू ही “कृपालु” सरकार॥

17भावार्थ—भक्त अपने इष्ट पर बलिहार जाते हुए कहता है-हे

18ब्रजराज कुमार! चारों वेद तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुमसे सृष्टि

19कर्ता ब्रह्मा, सृष्टि का पालन करने वाले विष्णु एवं सृष्टिसंहार

20करने वाले शिव भी पराजय स्वीकार करते हैं। तुम परिपूर्णतम

21साकार ब्रह्म हो। तुम चिदानन्दमय हो। तुम्हारा शरीर सुख-समूह-

22स्वरूप है।

23चिदानन्दमय देह तुम्हारी।

24तुम दिव्य प्रेम के ही अवतार हो। तुम्हारी महिमा अवर्णनीय

25है। तुम अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों की रचना करने वाले हो। तुम से

26ही सम्पूर्ण सृष्टि का पालन होता है। जगत् के संहारकर्ता भी एकमात्र

27तुम ही हो। तुम्हारी महिमा अतुलनीय है। तुम अपनी अलौकिक

28रूप-माधुरी से त्रिभुवन को भी मोहित कर लेते हो। जगत् को

29मोहित करने वाले कामदेव को भी अपने रूप-लावण्य से तुमने

30मोहित कर लिया। आश्चर्य तो यह है कि अपने रूप को दर्पण में

31निहारकर तुम स्वयं भी मोहित हो जाते हो। हे श्रीकृष्ण! दीनों के

32रक्षक तो एकमात्र तुम ही हो। पतितजनों को भव-सिन्धु से पार

33करने के लिये तुम पतवार-स्वरूप हो। निराधारों के आधार एकमात्र

34तुम ही हो। तुम्हारी महिमा का पार किसी ने भी नहीं पाया-

35नारद से शुक व्यास रटें पचि हारे तऊ पुनि पार न पायो।

36हे नाथ! आप सदा ही अपने भक्तों के वश में रहते हो। तुम

37संसार में सर्वत्र व्यापक हो। तुम जड़-चेतन सभी के प्राणों के

38अवलम्ब हो। तुम्हारी महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ हो

39सकता है? तुम प्रेमामृत के सार स्वरूप हो। अगणित दिव्य गुणों

40से मंडित होकर भी तुम्हारा हृदय करुणा से परिपूर्ण है। हे श्रीकृष्ण!

41तुम ब्रजयुवतियों को आनन्द प्रदान करने वाले हो। तुम्हारी महिमा

42का गायन करने में सभी असमर्थ हैं। हे नाथ! तुम अपने चरणों का

43आश्रय लेने वाले शरणागत भक्तों की रक्षा करने में सदैव तत्पर

44रहते हो। तुम सर्वान्तर्यामी हो। श्री कृपालुजी कहते हैं कि हे श्री

45कृष्ण तुम ही ब्रज-रस के अपार समुद्र हो। तुम ही हमारे स्वामी

46हो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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