Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मेरो है साँचो यार, नट नागर नंद कुमार,
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1मेरो है साँचो यार, नट नागर नंद कुमार,
2छवि कोटि काम बलिहार, सोई मम प्राणाधार।
3जो कनक मुकुट सिर धार, तनु नील जलद अनुहार,
4जेहि वेद न पायो पार, सोई मम प्राणाधार।
5जो हरि हरहूँ भरतार, लखि उमा रमा बलिहार,
6जो बन्यो भृत्य ब्रजनार, सोई मम प्राणाधार।
7जो प्रेम सुधा रस सार, जेहि छवि लखि छवि बलिहार,
8जो ललित त्रिभंगी यार, सोई मम प्राणाधार।
9जो यशुमति सुत रिझवार, जो जीवन धन ब्रजनार,
10जो नट वपु भेष सँवार, सोई मम प्राणाधार।
11जो रसिक प्राण साकार, जेहि लगि बनि गये शिव नार,
12जेहि महिमा अपरंपार, सोई “कृपालु” सरकार॥
13भावार्थ—भक्त कहता है-श्रेष्ठ नट के समान चतुर श्रीकृष्ण
14ही मेरे सच्चे मित्र हैं। उनकी शोभा को निहारकर करोड़ों कामदेव
15बलिहार जाते हैं। वे ही श्रीकृष्ण मेरे प्राणों के एकमात्र अवलम्ब
16हैं। जिनके सिर पर स्वर्ण का मुकुट है। शरीर का वर्ण नीले बादलों
17के समान है। जिसकी महिमा का गायन करने में वेद भी असमर्थता
18का अनुभव करते हैं, वे ही मेरे प्राणों के आश्रय हैं। जो श्रीकृष्ण
19महाविष्णु एवं शिव के भी स्वामी हैं। जिनकी मनोहर रूप-राशि
20पार्वती और महालक्ष्मी को भी लुभाने वाली है। जो ब्रजनारियों का
21खरीदा हुआ गुलाम बना है, वही नंदनंदन श्रीकृष्ण मेरे प्राणों के
22प्राण हैं। जो प्रेमामृत के भी सार स्वरूप हैं; जिसकी शोभा पर
23शोभा भी स्वयं को निछावर करती है, जो तीन स्थानों (ग्रीवा, कटि
24एवं चरण) से टेढ़े हैं, वे ही श्रीकृष्ण मेरे एकमात्र जीवन सर्वस्व
25हैं। जो यशोदा के प्रेम के कारण उनके पुत्र बन गये हैं, जो ब्रजगोपियों
26के जीवन-धन हैं, सुन्दर नट के समान जिन्होंने वेशभूषा धारण की
27है वे ही एकमात्र मेरे प्राणों के आधार हैं। रसिकों के प्राण स्वरूप
28श्रीकृष्ण जिनके रास-रस का आस्वादन करने के लिये शिव शिवानी
29बन गये। श्रीकृपालुजी कहते हैं- जिनकी महिमा का पार शिव,
30शुक आदि भी नहीं पा सके वे श्रीकृष्ण ही मेरे प्राण स्वरूप हैं।