लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

तोरी मोरी नाहिं बने कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

Reading 51 of 112 · Source no. 39 · Source PDF 88–90

1तोरी मोरी नाहिं बने कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

2जैसे मधुकर नित नये कान्हा,

3कुसुमन रस ले कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

4ऐसेहिं तोहूँ नित ही कान्हा,

5नई नई चह कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

6तू तो कह श्रुति महँ यह कान्हा,

7रति अनन्य करु कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

8पर उपदेश कुशल तू कान्हा,

9आपुन हित नहिं कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

10मैंने नहिं जाना तोहिं कान्हा,

11मैं थी भोरी कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

12सखिन बतायेहु जब मोहिं कान्हा,

13दिये तोहिं तजि कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

14जग महँ सबै चहत यह कान्हा,

15मम पिय रह मम कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

16तोहिं काहू को डर नहिं कान्हा,

17लोकहुँ वेदहुँ कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

18याते जो मनभावे कान्हा,

19करत सोइ तू कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

20अब नहिं दाल गले तव कान्हा,

21जाहु अनत कहुँ कान्हा, जा जा जा जा कान्हा।

22सखि है अति “कृपालु” यह कान्हा,

23करु न रोष तू कान्हा, जा जा जा जा कान्हा॥

24भावार्थ—कोई ब्रजगोपी श्रीकृष्ण से कहती है-जा जा। तेरे

25साथ मेरा मन कभी मेल नहीं खा सकता। जिस प्रकार भ्रमर प्रत्येक

26पुष्प पर जाकर उसका रस लेकर उड़ जाता है, उसी प्रकार तुम भी

27नित्य ही नवीन-नवीन ब्रज बालाओं से प्रेम करते हो। पुनः उनका

28त्यागकर किसी अन्य गोपी से सम्बन्ध जोड़ लेते हो। वेद में तो तुम

29दूसरों को उपदेश देते हो कि मुझसे अनन्य प्रेम करो, किन्तु स्वयं

30तो किसी एक ही गोपी से प्रेम नहीं करते। हे कृष्ण! तुम दूसरों को

31ही उपदेश देने में कुशल हो। स्वयं तो उस उपदेश का पालन नहीं

32करते। मैं अत्यन्त भोली थी; अतः तुम्हारा यह जाल समझ नहीं

33सकी। सखियों द्वारा तुम्हारे इस रहस्य को जानकर मैंने अब तुम्हारा

34त्याग कर दिया है। संसार में तो सब यही चाहते हैं कि मेरा पति

35केवल मुझसे ही प्रेम करे। तुम तो लोक-वेद से परे अत्यन्त स्वतंत्र

36हो; तुम्हें भला किसका भय है? अतः तुम मनमाना आचरण करते

37हो। हे कृष्ण! अब मेरे साथ तुम्हारी चतुराई नहीं चलेगी। कहीं

38किसी अन्य भोली-भाली गोपी के पास जाकर उसे अपने वाग्जाल

39में फँसाना। “कृपालुजी” अपने शब्दों में सखी से कहते हैं- हे

40सखी! तू इन पर क्रोध न कर। ये कृपा परवश होकर ही समस्त

41जीवों को प्रेमदान देते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version