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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

ओली माय थुनु कह कान्ह तुतुराय।

Reading 42 of 112 · Source no. 30 · Source PDF 72–76

1ओली माय थुनु कह कान्ह तुतुराय।

2दुलु बिनु द्यान नहिं कभु कोउ पाय॥

3हाँ हाँ लाला गुरु ही दे ज्ञान कह माय।

4तूने यह कैसे जाना मोय तो बताय॥

5आजु रह्यो खेलत सखा सँग माय।

6यमुना के तट तहँ ब्रजवासी आय॥

7इतने में तहँ दुर्वासा मुनि आय।

8पुनि मुनि प्रवचन दिये तहँ माय॥

9मुनि ने बताया जीव अज्ञानी आय।

10गुरु ज्ञान बिनु अज्ञान नहिं जाय॥

11पुनि मुनि कह जीव ब्रह्म अंश आय।

12जीव का तो लक्ष्य ब्रह्म प्राप्ति बताय॥

13मुनि कह तनु को तो माटी ने बनाय।

14पुनि मरि तनु माटी महँ मिलि जाय॥

15तनु जासों पले जासों बढ़े सोउ माय।

16अन्न जल आदि को भी माटी उपजाय॥

17हाँ हाँ लाला ऐसा ही है साँचो कह माय।

18कह कान्ह याते वाय गुरु हौं बनाय॥

19दुर्वासा तो हैं बड़़े गुरु कह माय।

20अच्छा किया लिया वाय गुरु जो बनाय॥

21मुनि तनु को तो माटी पुतला बताय।

22इस पुतले को जीव चेतन नचाय॥

23इक बात समझ में नहिं आय माय।

24तोसों पूछूँ माय वाय तू ही समुझाय॥

25माटी ते बना है तनु माटी पाले वाय।

26अंत में भी तनु माटी महँ मिलि जाय॥

27पुनि माटी खाने को तू रोके काहे माय।

28दूध दही आदि को भी माटी उपजाय॥

29लाला की चालाकी को समुझि गई माय।

30माय ने कही सुनु सुनु बलभाय॥

31बड़े बड़े तरु भी तो माटी उपजाय।

32देखु उत लाला हाँ हाँ देखूँ देखूँ माय॥

33ऐसे ही जो लाला तू माटी नित खाय।

34बड़े बड़े तरु सोइ माटी उपजाय॥

35निकलेंगे उदर ते तरु कह माय।

36नाक कान मुख ते वे बाहर आय॥

37पुनि झूलें झूला डारि सखा समुदाय।

38पुनि तू भी रोये कहे माय बचाय॥

39भोरो कान्ह मानि गयो कह्यो पुनि माय।

40अब न कबहुँ तेरो कान्ह माटी खाय॥

41अभी तो तू भोरो भारो छोटो बलभाय।

42बड़ा हो “कृपालु” गुरु मुनि को बनाय॥

43भावार्थ—बालगोपाल तुतलाते हुए यशोदा मैया से कहते हैं

44अरी मैया! मैंने सुना है कि बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

45यशोदा ने उत्तर दिया-लाला! ठीक ही है बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त

46नहीं होता किन्तु तुमने यह कैसे जाना कि गुरु से ही ज्ञान प्राप्त

47होता है? बाल गोपाल मैया को उत्तर देते हैं। मैया! आज मैं

48सखाओं के साथ यमुना किनारे खेल रहा था, वहाँ पर कुछ ब्रजवासी

49आये। उसके पश्चात् दुर्वासा मुनि भी वहाँ आये। दुर्वासा ने उन्हें

50उपदेश दिया। ऋषि ने ब्रजवासियों से कहा-जीव का अज्ञान गुरु

51द्वारा दिये हुए ज्ञान से ही जाता है। दुर्वासा मुनि ने अपने उपदेश में

52बताया कि जीव ब्रह्म का अंश है। इसलिये जीव का एकमात्र

53लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति ही है। ऋषि ने कहा कि शरीर मिट्टी का ही

54बना हुआ है। मरने के बाद भी मिट्टी में ही मिल जाता है। अन्न,

55जल आदि जिससे कि शरीर की वृद्धि एवं पोषण होता है वे भी

56मिट्टी (पृथ्वी) से ही उत्पन्न होते हैं। माता यशोदा ने कहा-कन्हैया!

57दुर्वासा मुनि ने ठीक ही कहा है। कन्हैया ने माता से कहा मैंने

58दुर्वासा को अपना गुरु बना लिया है। माता यशोदा बोलीं-दुर्वासा

59तो बहुत बड़े गुरु हैं, तुमने जो उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लिया,

60वह उचित ही किया है। कन्हैया माता यशोदा से कहने लगे-चेतन

61जीव मिट्टी के पुतले शरीर को अपनी इच्छानुसार चलाता है, ऐसा

62मेरे गुरु दुर्वासा ने बताया। मैया! मेरी समझ में एक बात नहीं आती

63है, उस बात को तुम ही समझा दो। बात यह है कि शरीर मिट्टी से

64ही बना है। मिट्टी से ही उसका पोषण होता है, अन्त में भी मिट्टी

65में ही मिल जाता है। फिर तुम मुझे मिट्टी खाने से रोकती क्यों हो?

66दूध, दही आदि भी तो मिट्टी से ही उत्पन्न होते हैं। माता यशोदा

67अपने पुत्र की चतुराई को समझकर बोलीं- लाला! मिट्टी से ही

68बड़े-बड़े वृक्ष भी उत्पन्न होते हैं। यदि तुम मिट्टी खाओगे तो उस

69मिट्टी से पेट में बड़े-बड़े वृक्ष उत्पन्न हो जायेंगे। तुम्हारे पेट से,

70नाक, कान और मुख से भी फिर वे वृक्ष बाहर निकलेंगे। तुम्हारे

71मनसुखा आदि सखा उन वृक्षों पर झूला डालकर झूलेंगे। फिर तुम

72रोकर मुझसे कहोगे कि मेरी रक्षा करो। इस प्रकार भोले-भाले

73कन्हैया ने माँ के डराये जाने पर मिट्टी न खाने की बात स्वीकार

74कर ली। कन्हैया कहने लगे- मैं अब कभी मिट्टी नहीं खाऊँगा

75कृपालुजी के शब्दों में- यशोदा बोलीं- कन्हैया! अभी तुम छोटे

76हो जब बड़े हो जाओगे तब दुर्वासा मुनि को अपना गुरु बना

77लेना।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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