# ओली माय थुनु कह कान्ह तुतुराय।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-030
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 72–76



<a id="line-1"></a>ओली माय थुनु कह कान्ह तुतुराय।  
<a id="line-2"></a>दुलु बिनु द्यान नहिं कभु कोउ पाय॥  
<a id="line-3"></a>हाँ हाँ लाला गुरु ही दे ज्ञान कह माय।  
<a id="line-4"></a>तूने यह कैसे जाना मोय तो बताय॥

<a id="line-5"></a>आजु रह्यो खेलत सखा सँग माय।  
<a id="line-6"></a>यमुना के तट तहँ ब्रजवासी आय॥  
<a id="line-7"></a>इतने में तहँ दुर्वासा मुनि आय।  
<a id="line-8"></a>पुनि मुनि प्रवचन दिये तहँ माय॥  
<a id="line-9"></a>मुनि ने बताया जीव अज्ञानी आय।  
<a id="line-10"></a>गुरु ज्ञान बिनु अज्ञान नहिं जाय॥  
<a id="line-11"></a>पुनि मुनि कह जीव ब्रह्म अंश आय।  
<a id="line-12"></a>जीव का तो लक्ष्य ब्रह्म प्राप्ति बताय॥  
<a id="line-13"></a>मुनि कह तनु को तो माटी ने बनाय।  
<a id="line-14"></a>पुनि मरि तनु माटी महँ मिलि जाय॥  
<a id="line-15"></a>तनु जासों पले जासों बढ़े सोउ माय।  
<a id="line-16"></a>अन्न जल आदि को भी माटी उपजाय॥  
<a id="line-17"></a>हाँ हाँ लाला ऐसा ही है साँचो कह माय।  
<a id="line-18"></a>कह कान्ह याते वाय गुरु हौं बनाय॥  
<a id="line-19"></a>दुर्वासा तो हैं बड़़े गुरु कह माय।  
<a id="line-20"></a>अच्छा किया लिया वाय गुरु जो बनाय॥  
<a id="line-21"></a>मुनि तनु को तो माटी पुतला बताय।  
<a id="line-22"></a>इस पुतले को जीव चेतन नचाय॥  
<a id="line-23"></a>इक बात समझ में नहिं आय माय।  
<a id="line-24"></a>तोसों पूछूँ माय वाय तू ही समुझाय॥  
<a id="line-25"></a>माटी ते बना है तनु माटी पाले वाय।  
<a id="line-26"></a>अंत में भी तनु माटी महँ मिलि जाय॥  
<a id="line-27"></a>पुनि माटी खाने को तू रोके काहे माय।  
<a id="line-28"></a>दूध दही आदि को भी माटी उपजाय॥

<a id="line-29"></a>लाला की चालाकी को समुझि गई माय।  
<a id="line-30"></a>माय ने कही सुनु सुनु बलभाय॥  
<a id="line-31"></a>बड़े बड़े तरु भी तो माटी उपजाय।  
<a id="line-32"></a>देखु उत लाला हाँ हाँ देखूँ देखूँ माय॥  
<a id="line-33"></a>ऐसे ही जो लाला तू माटी नित खाय।  
<a id="line-34"></a>बड़े बड़े तरु सोइ माटी उपजाय॥  
<a id="line-35"></a>निकलेंगे उदर ते तरु कह माय।  
<a id="line-36"></a>नाक कान मुख ते वे बाहर आय॥  
<a id="line-37"></a>पुनि झूलें झूला डारि सखा समुदाय।  
<a id="line-38"></a>पुनि तू भी रोये कहे माय बचाय॥  
<a id="line-39"></a>भोरो कान्ह मानि गयो कह्यो पुनि माय।  
<a id="line-40"></a>अब न कबहुँ तेरो कान्ह माटी खाय॥  
<a id="line-41"></a>अभी तो तू भोरो भारो छोटो बलभाय।  
<a id="line-42"></a>बड़ा हो “कृपालु” गुरु मुनि को बनाय॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-43"></a>भावार्थ—बालगोपाल तुतलाते हुए यशोदा मैया से कहते हैं  
<a id="line-44"></a>अरी मैया! मैंने सुना है कि बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं होता।  
<a id="line-45"></a>यशोदा ने उत्तर दिया-लाला! ठीक ही है बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त  
<a id="line-46"></a>नहीं होता किन्तु तुमने यह कैसे जाना कि गुरु से ही ज्ञान प्राप्त  
<a id="line-47"></a>होता है? बाल गोपाल मैया को उत्तर देते हैं। मैया! आज मैं  
<a id="line-48"></a>सखाओं के साथ यमुना किनारे खेल रहा था, वहाँ पर कुछ ब्रजवासी  
<a id="line-49"></a>आये। उसके पश्चात् दुर्वासा मुनि भी वहाँ आये। दुर्वासा ने उन्हें  
<a id="line-50"></a>उपदेश दिया। ऋषि ने ब्रजवासियों से कहा-जीव का अज्ञान गुरु  
<a id="line-51"></a>द्वारा दिये हुए ज्ञान से ही जाता है। दुर्वासा मुनि ने अपने उपदेश में

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-52"></a>बताया कि जीव ब्रह्म का अंश है। इसलिये जीव का एकमात्र  
<a id="line-53"></a>लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति ही है। ऋषि ने कहा कि शरीर मिट्टी का ही  
<a id="line-54"></a>बना हुआ है। मरने के बाद भी मिट्टी में ही मिल जाता है। अन्न,  
<a id="line-55"></a>जल आदि जिससे कि शरीर की वृद्धि एवं पोषण होता है वे भी  
<a id="line-56"></a>मिट्टी (पृथ्वी) से ही उत्पन्न होते हैं। माता यशोदा ने कहा-कन्हैया!  
<a id="line-57"></a>दुर्वासा मुनि ने ठीक ही कहा है। कन्हैया ने माता से कहा मैंने  
<a id="line-58"></a>दुर्वासा को अपना गुरु बना लिया है। माता यशोदा बोलीं-दुर्वासा  
<a id="line-59"></a>तो बहुत बड़े गुरु हैं, तुमने जो उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लिया,  
<a id="line-60"></a>वह उचित ही किया है। कन्हैया माता यशोदा से कहने लगे-चेतन  
<a id="line-61"></a>जीव मिट्टी के पुतले शरीर को अपनी इच्छानुसार चलाता है, ऐसा  
<a id="line-62"></a>मेरे गुरु दुर्वासा ने बताया। मैया! मेरी समझ में एक बात नहीं आती  
<a id="line-63"></a>है, उस बात को तुम ही समझा दो। बात यह है कि शरीर मिट्टी से  
<a id="line-64"></a>ही बना है। मिट्टी से ही उसका पोषण होता है, अन्त में भी मिट्टी  
<a id="line-65"></a>में ही मिल जाता है। फिर तुम मुझे मिट्टी खाने से रोकती क्यों हो?  
<a id="line-66"></a>दूध, दही आदि भी तो मिट्टी से ही उत्पन्न होते हैं। माता यशोदा  
<a id="line-67"></a>अपने पुत्र की चतुराई को समझकर बोलीं- लाला! मिट्टी से ही  
<a id="line-68"></a>बड़े-बड़े वृक्ष भी उत्पन्न होते हैं। यदि तुम मिट्टी खाओगे तो उस  
<a id="line-69"></a>मिट्टी से पेट में बड़े-बड़े वृक्ष उत्पन्न हो जायेंगे। तुम्हारे पेट से,  
<a id="line-70"></a>नाक, कान और मुख से भी फिर वे वृक्ष बाहर निकलेंगे। तुम्हारे  
<a id="line-71"></a>मनसुखा आदि सखा उन वृक्षों पर झूला डालकर झूलेंगे। फिर तुम  
<a id="line-72"></a>रोकर मुझसे कहोगे कि मेरी रक्षा करो। इस प्रकार भोले-भाले  
<a id="line-73"></a>कन्हैया ने माँ के डराये जाने पर मिट्टी न खाने की बात स्वीकार  
<a id="line-74"></a>कर ली। कन्हैया कहने लगे- मैं अब कभी मिट्टी नहीं खाऊँगा

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-75"></a>कृपालुजी के शब्दों में- यशोदा बोलीं- कन्हैया! अभी तुम छोटे  
<a id="line-76"></a>हो जब बड़े हो जाओगे तब दुर्वासा मुनि को अपना गुरु बना  
<a id="line-77"></a>लेना।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
