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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

तू ही रहु ब्रज अब मैया, मैया मैया मैया।

Reading 40 of 112 · Source no. 28 · Source PDF 69–71

1तू ही रहु ब्रज अब मैया, मैया मैया मैया।

2अति करि दीनी कन्हैया मैया,

3सहि न जाय अब मैया, मैया मैया मैया।

4हम जब जाँय यमुन तट मैया,

5खरो रहै तहँ मैया, मैया मैया मैया।

6काहुहिं गर लर तोरे मैया,

7काहु फोरे घट मैया, मैया मैया मैया।

8छोटो अति खोटो यह मैया,

9खोले घूँघट मैया, मैया मैया मैया।

10नैनन बान चलावत मैया,

11घायल कर सखि मैया, मैया मैया मैया।

12कबहुँ बिरावत दशनन मैया,

13जीभ दिखावत मैया, मैया मैया मैया।

14पुनि कह हौं तेरो पिय मैया,

15तू हूँ कह पिय मैया, मैया मैया मैया।

16सुनि गारी दारी के मैया,

17कह पुनि पुनि दे मैया, मैया मैया मैया।

18जो दौरूँ पकरन कहँ मैया,

19होय अलक्षित मैया, मैया मैया मैया।

20जादूगर “कृपालु” यह मैया,

21हारे हरि हर मैया, मैया मैया मैया॥

22भावार्थ—ब्रज गोपियाँ यशोदा को उलाहना दे रही हैं-हे

23यशोदा! अब तो ब्रज में केवल तुम और तुम्हारा पुत्र कृष्ण ही

24रहेगा। अरी मैया! कन्हैया ने तो चंचलता की पराकाष्ठा कर दी।

25अब तक हमने सहन कर लिया अब हमसे सहन नहीं होगा। पुनः

26गोपियाँ यशोदा से कहती हैं-हम सब जब जल भरने अथवा स्नान

27करने हेतु यमुना के तट पर जाती हैं तब तुम्हारा नटखट पुत्र पहले

28से ही वहाँ जाकर खड़ा हो जाता है। जब हम निकट पहुँचतीं हैं

29तब वह किसी गोपी के हृदय का हार तोड़ डालता है एवं किसी

30का जलपूर्ण घट फोड़ देता है। यह है तो छोटा परन्तु अत्यन्त ढीठ

31है। ब्रजगोपियोँ के घूँघट खोल देता है। अपने नेत्रों द्वारा रसभरे

32कटाक्षपात करके सखियों को घायल करता रहता है। किसी को

33दाँत दिखाकर चिढ़ाता है तो कभी जीभ निकालकर बिराता है।

34किसी सखी से कहता कि मैं तेरा पति हूँ, तू अपने मुख से मुझे

35अपना प्रियतम कह। यदि कोई गोपी इसे “दारी के” गाली देती है

36तो प्रसन्न होकर कहता है कि पुनः गाली दे। यदि कोई सखी

37इसको पकड़ने को दौड़ती है तो यह तत्काल अदृश्य हो जाता है।

38श्री कृपालुजी कहते हैं- मैया! तुम्हारा यह पुत्र तो बड़ा जादूगर है।

39इससे तो विष्णु एवं शिव भी हार मान गये।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version