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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

गावो गुन गन राधा, ध्यावो छविनिधि राधा,

Reading 79 of 119 · Source no. 68 · Source PDF 144–145

1गावो गुन गन राधा, ध्यावो छविनिधि राधा,

2जावो जहँ रह राधा, जय जयति जयति राधा।

3जपु नित्य नाम राधा, सुनु नित्य कथा राधा,

4गहु चरण शरण राधा, जय जयति जयति राधा।

5विधि भजत नित्य राधा, हरि भजत नित्य राधा,

6हर भजत नित्य राधा, जय जयति जयति राधा।

7सनकादिक भज राधा, जनकादिक भज राधा,

8भज नारदादि राधा, जय जयति जयति राधा।

9अग जग व्यापक राधा, सब उरपुर रह राधा,

10सब पर करुणा राधा, जय जय “कृपालु” राधा।

11भावार्थ—भक्त कवि अपने मन से कहता है- हे मेरे

12मन! तू निरन्तर श्रीराधा का ही गुणगान कर। छवि की अगाध

13समुद्र श्री राधा का ही ध्यान कर। जहाँ श्रीराधा वास करती हैं,

14वहीं तू भी विचरण कर। श्रीराधा की सदैव विजय हो। निरन्तर

15श्रीराधा नाम का जप कर। श्रवणों से सतत् श्रीराधा-कथामृत

16का पान कर। श्रीराधा के ही युगल चरणों की शरण ग्रहण कर।

17श्रीराधा सदा जय प्राप्त करें। ब्रह्मा निरन्तर श्रीराधा का ही सेवन

18करते हैं। विष्णु एवं शिव भी सदा श्रीराधा की ही सेवा वासना

19रखते हैं, ऐसी श्रीराधा सदा ही विजयिनि हों। सनकादि परमहंस

20गण, जनक आदि ज्ञानी जन एवं नारद जैसे भागवत भी श्रीराधा

21का स्मरण, वन्दन आदि करते हैं। आह्लादिनी शक्तिरूपा श्रीराधा

22जड़-चेतन सम्पूर्ण जगत् में व्यापक हैं। सभी प्राणियों के हृदय

23में उनका निवास है। सभी जीव समान रूप से श्रीराधा की

24करुणा के अधिकारी हैं, ऐसी श्रीराधा सर्वदा जय को प्राप्त हों।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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