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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

लखि न जात छवि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Reading 74 of 119 · Source no. 63 · Source PDF 134–135

1लखि न जात छवि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

2जब जब लखत आव दृग कान्हा,

3आनँद जल भरि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

4पल पल पलक ओट कर कान्हा,

5मम बैरिनि बनि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

6लखतहुँ यह भय रह नित कान्हा,

7छिनि न जाय सुख कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

8विरह काल में तो दृग कान्हा,

9झर झर बरसत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

10पल कल नहिं बिनु देखे कान्हा,

11विकल विरह महँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

12जितनोई सुख मिल लखि कान्हा,

13रूप माधुरी कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

14तितनोई वियोग महँ कान्हा,

15मिलत दुसह दुख कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

16रसिकन कहत मिलन ते कान्हा,

17सरस विरह रस कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

18विरह प्रेम रस ऐसो कान्हा,

19जित देखूँ तित कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

20तब सब ही कह मोहिं लखि कान्हा,

21आई बावरि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

22धरि “कृपालु” सिर ओखलि कान्हा,

23अब न सोचु सखि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥

24भावार्थ—एक गोपी अपनी स्थिति को प्रकट कर रही है

25कि कन्हैया की अनुपम छवि देखी नहीं जाती है। जब जब इस

26छवि को देखती हूँ तो नेत्र आनन्द जल से परिपूर्ण हो जाते हैं।

27पलकें भँजने के कारण कन्हैया के दर्शनों में विक्षेप होता है

28अतः उन्हें बैरिनी की संज्ञा देती है। देखने पर यह भय बना

29रहता है कि कहीं ये दर्शन-सुख छिन न जाय। वियोगावस्था में

30तो इन नेत्रों से निरन्तर वर्षा की भाँति झड़ी ही लग जाती है।

31विरह में दर्शन की व्याकुलता इतनी बढ़ जाती है कि एक क्षण

32भी दर्शन के बिना नहीं रहा जाता। जितना सुख श्रीकृष्ण के

33दर्शन में मिलता है उतना ही दुःख उनके विरह में मिलता है।

34रसिक जनों की मान्यता है कि श्रीकृष्ण के मिलन रस से अधिक

35सरस विरह का रस होता है कारण कि मिलन में तो अपना

36प्रिय एक स्थान पर ही दृष्टिगोचर होता है किंतु विरह में

37(सर्वव्यापक) कण कण में दृष्टिगत होता है। मेरी ऐसी स्थिति

38को देखकर मुझे सभी लोग पागल घोषित करते हैं।“कृपालु”

39कहते हैं कि हे सखी! जब तूने ओखली में सिर रख ही दिया

40तो फिर चोट से न घबरा। श्रीकृष्ण से प्रेम कर लिया तो बदनामी

41मत सोच।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version