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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

दीनबंधु गुन भाये कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Reading 41 of 119 · Source no. 30 · Source PDF 71–73

1दीनबंधु गुन भाये कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

2सुनि गुन भक्तवत्सलहिं कान्हा,

3अति डर लागे मोय कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

4मैं तो हूँ सदा ते भक्त जग का ही कान्हा,

5याते जग भाये मोय कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

6रसिकन मुख सुन्यो बार बार कान्हा,

7जीव का तो सर्वस कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

8किंतु किया सुना अनसुना नित कान्हा,

9करी नहिं भक्ति तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

10सुत वित नारि पति आसक्ति कान्हा,

11मन न तजन चह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

12माँगा जन जन ते भिखारी बनि कान्हा,

13नित्य दिव्य सुख कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

14किंतु वे भी थे भिखारी मेरी भाँति कान्हा,

15सब ही ने धोखा दिया कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

16अगनित जनम गमाये मैंने कान्हा,

17यूँ ही भीख माँगन महँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

18जनम जनम का भिखारी मैं हूँ कान्हा,

19मोते बड़ो दीन कौन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

20यदि यह सच तू है दीनबंधु कान्हा,

21बन जा तू मेरा बंधु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

22दीन भाव झूठा तेरा यदि कहु कान्हा,

23कैसे बने तेरा बंधु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

24तू “कृपालु” भी तो है तू कृपा करि कान्हा,

25दीन बना दे मोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।।

26भावार्थ—भक्त अपने इष्ट के प्रति कह रहा है- हे

27कन्हैया, मुझे तो तुम्हारा “दीनबन्धु” गुण प्रिय लगता है।

28“भक्तवत्सल” गुण को सुनकर तो मैं भयभीत हो जाता हूँ। हे

29कृष्ण! मैं तो सदा से संसार का ही भक्त हूंँ। मुझे तो संसार ही

30सुहाता है। यद्यपि रसिक-जनों से बार बार मैंने सुना है- तुम

31ही जीव के एकमात्र सर्वस्व हो। परन्तु मैंने रसिक संतों की

32वाणी को सुनकर भी अनसुना कर दिया। मैंने कभी स्वप्न में

33भी तुम्हारी भक्ति नहीं की। हे श्री कृष्ण! मेरा मन पुत्र, स्त्री,

34पति एवं धनादि की आसक्ति का त्याग नहीं करना चाहता। मैंने

35सदा से संसार के समक्ष भिखारी बनकर प्रत्येक जीव से दिव्य

36सुख प्राप्त करने की चेष्टा की, किंतु वे तो मेरे समान भिखारी

37ही थे। अतः मुझे सबसे धोखा ही प्राप्त हुआ। इस प्रकार से

38जगत् से सुख की भीख माँगते हुए मैंने असंख्यों जन्म नष्ट कर

39दिये। हे दीनबन्धु! मैं जन्म जन्म का भिखारी हूँ अतः मुझसे

40बढ़कर दीन तुम्हें कौन मिलेगा? यदि तुम वास्तव में दीनबन्धु

41हो तो मेरे बन्धु बनकर दिखा दो। यदि तुम कहते हो कि मेरी

42दीनता कृत्रिम है तो तुम अपनी कृपा से मुझे दीन बना दो। तुम

43अकारण“कृपालु”भी तो हो, अतः किसी भी प्रकार से मेरे

44बनकर दिखा दो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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