# दीनबंधु गुन भाये कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-030
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Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 71–73



<a id="line-1"></a>दीनबंधु गुन भाये कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-2"></a>सुनि गुन भक्तवत्सलहिं कान्हा,  
<a id="line-3"></a>अति डर लागे मोय कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-4"></a>मैं तो हूँ सदा ते भक्त जग का ही कान्हा,  
<a id="line-5"></a>याते जग भाये मोय कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-6"></a>रसिकन मुख सुन्यो बार बार कान्हा,  
<a id="line-7"></a>जीव का तो सर्वस कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-8"></a>किंतु किया सुना अनसुना नित कान्हा,  
<a id="line-9"></a>करी नहिं भक्ति तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-10"></a>सुत वित नारि पति आसक्ति कान्हा,  
<a id="line-11"></a>मन न तजन चह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-12"></a>माँगा जन जन ते भिखारी बनि कान्हा,  
<a id="line-13"></a>नित्य दिव्य सुख कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-14"></a>किंतु वे भी थे भिखारी मेरी भाँति कान्हा,  
<a id="line-15"></a>सब ही ने धोखा दिया कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-16"></a>अगनित जनम गमाये मैंने कान्हा,  
<a id="line-17"></a>यूँ ही भीख माँगन महँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-18"></a>जनम जनम का भिखारी मैं हूँ कान्हा,

<a id="line-19"></a>मोते बड़ो दीन कौन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-20"></a>यदि यह सच तू है दीनबंधु कान्हा,  
<a id="line-21"></a>बन जा तू मेरा बंधु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-22"></a>दीन भाव झूठा तेरा यदि कहु कान्हा,  
<a id="line-23"></a>कैसे बने तेरा बंधु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-24"></a>तू “कृपालु” भी तो है तू कृपा करि कान्हा,  
<a id="line-25"></a>दीन बना दे मोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-26"></a>भावार्थ—भक्त अपने इष्ट के प्रति कह रहा है- हे  
<a id="line-27"></a>कन्हैया, मुझे तो तुम्हारा “दीनबन्धु” गुण प्रिय लगता है।  
<a id="line-28"></a>“भक्तवत्सल” गुण को सुनकर तो मैं भयभीत हो जाता हूँ। हे  
<a id="line-29"></a>कृष्ण! मैं तो सदा से संसार का ही भक्त हूंँ। मुझे तो संसार ही  
<a id="line-30"></a>सुहाता है। यद्यपि रसिक-जनों से बार बार मैंने सुना है- तुम  
<a id="line-31"></a>ही जीव के एकमात्र सर्वस्व हो। परन्तु मैंने रसिक संतों की  
<a id="line-32"></a>वाणी को सुनकर भी अनसुना कर दिया। मैंने कभी स्वप्न में  
<a id="line-33"></a>भी तुम्हारी भक्ति नहीं की। हे श्री कृष्ण! मेरा मन पुत्र, स्त्री,  
<a id="line-34"></a>पति एवं धनादि की आसक्ति का त्याग नहीं करना चाहता। मैंने  
<a id="line-35"></a>सदा से संसार के समक्ष भिखारी बनकर प्रत्येक जीव से दिव्य  
<a id="line-36"></a>सुख प्राप्त करने की चेष्टा की, किंतु वे तो मेरे समान भिखारी  
<a id="line-37"></a>ही थे। अतः मुझे सबसे धोखा ही प्राप्त हुआ। इस प्रकार से  
<a id="line-38"></a>जगत् से सुख की भीख माँगते हुए मैंने असंख्यों जन्म नष्ट कर  
<a id="line-39"></a>दिये। हे दीनबन्धु! मैं जन्म जन्म का भिखारी हूँ अतः मुझसे  
<a id="line-40"></a>बढ़कर दीन तुम्हें कौन मिलेगा? यदि तुम वास्तव में दीनबन्धु  
<a id="line-41"></a>हो तो मेरे बन्धु बनकर दिखा दो। यदि तुम कहते हो कि मेरी

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-42"></a>दीनता कृत्रिम है तो तुम अपनी कृपा से मुझे दीन बना दो। तुम  
<a id="line-43"></a>अकारण“कृपालु”भी तो हो, अतः किसी भी प्रकार से मेरे  
<a id="line-44"></a>बनकर दिखा दो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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