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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

सुनु मन लक्षण प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

Reading 34 of 119 · Source no. 23 · Source PDF 57–59

1सुनु मन लक्षण प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

2दत्त चित्त हरि सुमिरत प्रेमी,

3होत खंभ सम प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

4रूप माधुरी सुमिरत प्रेमी,

5होत स्वेदयुत प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

6सुमिरत होत हर्षयुत प्रेमी,

7पुलक रोम प्रति प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

8सुमिरत अधिक हर्ष ते प्रेमी,

9स्वर गदगद हो प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

10सुमिरत दिव्य श्याम छवि प्रेमी,

11होत कंप तनु प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

12विरह अगिनि तपि विरही प्रेमी,

13हो विवर्ण तनु प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

14सुमिरि मिलन सुख नैनन प्रेमी,

15आनँद जल बह प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

16दरशन हित दृग व्याकुल प्रेमी,

17अश्रुधार बह प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

18सुमिरि श्याम बूड़े मन प्रेमी,

19तब मुर्छित हो प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

20सात्विक भाव आठ इमि प्रेमी,

21तनु प्रकटत नित प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

22प्रेम “कृपालु” बढ़ै जित प्रेमी,

23प्रकट भाव तित प्रेमी, प्रेमी प्रेमी प्रेमी।

24भावार्थ—प्रेमियों के लक्षण बताते हुए कहा गया है

25श्री हरि-में अनुराग करने वाले प्रेमी जन एकाग्रचित्त होकर

26अपने प्राणों के प्राण श्री कृष्ण का चिंतन करते हुए “स्तम्भ”

27नामक सात्विक भाव को प्राप्त होकर जड़ के समान प्रतीत होते

28हैं। श्री हरि की अलौकिक रूपराशि का स्मरण करते हुए वे

29स्वेदयुक्त हो जाते हैं। कभी प्रियतम का स्मरण करते हुए रोमांचित

30हो उठते हैं। हरि-स्मरण में दत्तचित हुए प्रेमी-जनों का कण्ठ

31गद्गद् हो जाता हैं। श्यामसुन्दर की दिव्य छवि का समाधि में

32दर्शन प्राप्त कर प्रेमियों के शरीर में “वेपथु” नामक सात्विक

33भाव का उदय होता है तब वे काँपने लगते हैं। विरही के शरीर

34का रंग पीला पड़ जाता है। मिलन-सुख में डूबे हुए प्रेमी नेत्रों

35से आनन्दाश्रु बहाते रहते हैं। कभी दर्शन हेतु व्याकुल हुए नेत्रों

36से जलधारा प्रवाहित करते हैं। श्यामसुन्दर के स्मरण में सुध

37बुध भूले हुए प्रेमी “मूर्च्छा” नामक सात्विक भाव को प्राप्त हो

38जाते हैं। इस प्रकार प्रेमियों के शरीर में आठों सात्विक भाव

39(स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभेद, कम्प, वैवर्ण्य, अश्रु, मूर्च्छा)

40निरन्तर प्रकट होते रहते है। जितना प्रेम वृद्धि को प्राप्त होता

41है, उतने ही सात्विक भाव उदय होते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version