Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सुनहु साधक, सुनहु साधक, सुनहु साधक प्यारे।
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1सुनहु साधक, सुनहु साधक, सुनहु साधक प्यारे।
2तुम चहत आनंद शाश्वत दिव्य चिन्मय प्यारे।
3ब्रह्म या आनंद दोनों एक ही हैं प्यारे।
4ब्रह्म या आनंद के ही अंश हैं सब प्यारे।
5चहत नित आनंद याते जीव सब ही प्यारे।
6अंश निज अंशी का सेवक जगहुँ महँ रह प्यारे।
7ब्रह्म या परतत्व अंशी श्याम ही हैं प्यारे।
8जग चराचर जीव याते श्याम सेवक प्यारे।
9धर्म सेवक है इहै बस श्याम सेवा प्यारे।
10सदा ते ही हरि विमुख हैं जीव अगनित प्यारे।
11हरि विमुख जीवों को माया ने भुलाया प्यारे।
12गुणमयी हरि शक्ति माया बलवती अति प्यारे।
13जीव भूल्यो रूप आपुहिं देह मान्यो प्यारे।
14देह नातेदार ते किये प्यार निशिदिन प्यारे।
15बस इसी कारण किये नित पाप अगनित प्यारे।
16मर्त्य सुख अरु स्वर्ग सुख सब हैं विनश्वर प्यारे।
17सकल दुख का मूल है इक हरि विमुखता प्यारे।
18दुख सहे अध्यात्म भौतिक और दैविक प्यारे।
19लक्ष चौरासी में भटक्यो जनम अगनित प्यारे।
20हरिहिं सन्मुखता है याकी एक औषधि प्यारे।
21प्रथम श्रद्धा युक्त गुरु की शरण जाइय प्यारे।
22गुरु ते समुझिय श्याम सों संबंध अपनो प्यारे।
23गुरुहिं ते समझिय मिलन की साधना भी प्यारे।
24साधना है एक ही बस भक्ति हरि की प्यारे।
25श्रवण कीर्तन स्मरण ही है प्रमुख साधन प्यारे।
26स्मरण को ही साधना का प्राण मानो प्यारे।
27स्मरण युत नित रोके माँगो प्रेम हरि का प्यारे।
28उनके सुख को मानु निज सुख लक्ष्य यह रखु प्यारे।
29हरि में गुरु में भक्ति में रह रति अनन्यहिं प्यारे।
30हरि को गुरु को सदा ही राखु साथ अपने प्यारे।
31क्षणहिं क्षण व्याकुल बनो नित हरि मिलन हित प्यारे।
32भुक्ति मुक्तिन मानि डाकिनि मुँह लगा जनि प्यारे।
33नाम अपराधहिं बचहु अति पतन कारक प्यारे।
34हरि में जैसी भक्ति वैसी भक्ति गुरु महँ प्यारे।
35पूर्ण हो जब शुद्ध अन्तःकरण तुम्हरो प्यारे।
36हरि कृपा ते होय तब मन दिव्य चिन्मय प्यारे।
37तब कृपा करि देँय गुरुवर दिव्य प्रेमहिं प्यारे।
38तब मिलेगी श्याम सेवा लक्ष्य अन्तिम प्यारे।
39बेर जनि करु देह नश्वर जाने कब छिन प्यारे।
40दो “कृपालुहिं” प्रेम भिक्षा प्रेम अम्बुधि प्यारे।