Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
प्रेम अनिर्वचनीय कहाय।
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1(नीको लागे...)
2प्रेम अनिर्वचनीय कहाय।
3प्रेम दिव्य मन बुधि न समाय।
4ब्रह्म शक्ति अगनित बतलाय।
5वामें प्रमुख तीन बतलाय।
6जो सत चित आनंद कहाय।
7आनँद सार ह्लादिनी आय।
8ह्लादिनि सर्वश्रेष्ठ कहलाय।
9याते ब्रह्म सदा सुख पाय।
10ह्लादिनि सार प्रेम कहलाय।
11प्रेम अधीन रहत बलभाय।
12प्रेम स्वरूप सूक्ष्म बतलाय।
13प्रेम कामना-हीन कहाय।
14भुक्ति मुक्ति द्वै काम बताय।
15प्रेम गुणों ते रहित कहाय।
16प्रेम क्षणहिं क्षण बाढ़त जाय।
17प्रेम करोरन महँ कोउ पाय।
18प्रेम मूक ज्यों स्वाद बताय।
19अनुभव रूप प्रेम कहलाय।
20प्रेम कर्म ते रहित बताय।
21प्रेम योग ते रहित बताय।
22प्रेम ज्ञान ते रहित बताय।
23प्रेम सदैव स्वतंत्र बताय।
24प्रेम अधीन ज्ञान बतलाय।
25प्रेम अकारण रसिक बताय।
26प्रेम प्र्रेम हित भक्त बताय।
27प्रेम श्याम सुख हित बतलाय।
28देना देना प्रेम कहाय।
29लेना लेना काम कहाय।
30ले दे सो व्यापार कहाय।
31प्रेम दिव्य जनु सूर्य बताय।
32काम घोर तम जनु बतलाय।
33चार भाव युत प्रेम कहाय।
34एक दास्य इक सख्य कहाय।
35एक भाव वात्सल्य कहाय।
36अंतिम मधुर भाव कहलाय।
37मधुर भाव सर्वोच्च बताय।
38यामें चारिहुँ भाव समाय।
39मधुर भाव भी तीन बताय।
40इक रति साधारणी बताय।
41यह रति कुब्जादिक की आय।
42यामें निज सुख ही बतलाय।
43समंजसा इक रति कहलाय।
44यह रति महिषी गण की आय।
45यामें निज सुख पिय सुख आय।
46एक समर्था रति कहलाय।
47यह रति गोपी जन की आय।
48यामें केवल पिय सुख भाय।
49यही प्रेम अंतिम कहलाय।
50यही जीव का लक्ष्य बताय।
51जो गुरु गोपी प्रेमहिँ पाय।
52प्रेम “कृपालु” कृपा ते हि पाय॥