Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जयति गुरुवर जयति गुरुवर, जयति गुरुवर प्यारे।
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1जयति गुरुवर जयति गुरुवर, जयति गुरुवर प्यारे।
2तू ही ब्रह्मा तू ही विष्णु, तू ही शंकर प्यारे।
3तेरे पाछे चलत नटवर, चहत पदरज प्यारे।
4हरिहिं भावें शुद्ध जन तोहिं, पतित भावें प्यारे।
5तू तो अशरण शरण मोहूँ, शरण ले ले प्यारे।
6मैं हूँ श्रद्धाहीन मो सिर, धरहु निज कर प्यारे।
7तू करावे ज्ञान हरि को, श्रुति पुरानन प्यारे।
8तू बतावे हरि मिलन की, साधना भी प्यारे।
9तू जो हो अनुकूल तो हरि, भाजे आवें प्यारे।
10शुद्ध मन हो जाय तो तू, प्रेम भी दे प्यारे।
11कहत नारद भक्ति दर्शन, एक हरि गुरु प्यारे।
12भक्ति जस हरि की करहु तस, भक्ति करु गुरु प्यारे।
13गुरु मिलें तो हरि मिलें, नहिं, भेद हरि गुरु प्यारे।
14गुरुहिं हरि भज हरिहिं गुरु भज, भेद नहिं दोउ प्यारे।
15गुरु के उर रह हरि हरिहुँ के, रहत उर गुरु प्यारे।
16संत कह भगवान ते भी, हैं बड़े गुरु प्यारे।
17गुरु न कर कछु कर्म गुरु को, कर्म कर हरि प्यारे।
18गुरु को हरि का रूप मानहु, मानु नर नहिं प्यारे।
19गुरु को तनु जनि देख मन तू , देखु मन गुरु प्यारे।
20सत्य श्रद्धा सत्य सद्गुरु, सत्य फल मिल प्यारे।
21गुरुहिं ऋण ते उऋण नहिं कोउ, प्राणहूँ दै प्यारे।
22कहत हरि जो भक्त मेरे, भक्त नहिं मम प्यारे।
23भक्त के जो भक्त हैं वे, प्राण सम मम प्यारे।
24भक्त प्रति अपराध कर जो, सहि सकैं नहिं प्यारे।
25हरिहुँ ते पूरव करहु मन, गुरुहिं वंदन प्यारे।
26हो सदा को धन्य जो हो, शरण तेरी प्यारे।
27तेरी अनुकम्पा बिना कोउ, भक्ति पाव न प्यारे।
28हरि हैं सबके प्राण गुरु हैं, प्राणहूँ ते प्यारे।
29ज्ञान दें अज्ञान नासें, सोई गुरुवर प्यारे।
30ब्रह्म माया जीव का दें, ज्ञान गुरुवर प्यारे।
31“रौति गुं इति, गुरुः” तम को, दूर कर गुरु प्यारे।
32रौति गुं अज्ञान नासै-, सोई गुरु कह प्यारे।
33तीन गुण ते जो परे कर, सोई गुरुवर प्यारे।
34तीन तापन को मिटा दे, सोई गुरुवर प्यारे।
35तीन तनु ते जो छुड़ा दे, सोई गुरुवर प्यारे।
36पंचक्लेशन जो मिटा दे, सोई गुरुवर प्यारे।
37पंचकोशन जो जला दे, सोई गुरुवर प्यारे।
38प्रेम दे माया भगा दे, सोई गुरुवर प्यारे।
39हरि कृपा ते मिलहिं गुरुवर, शास्त्र कह अस प्यारे।
40गुरु कृपा ते मिलहिं हरि अस, कह पुरानन प्यारे।
41जो चहहु हरि की कृपा तो, गुरु शरण गहु प्यारे।
42भुक्ति मुक्ति कामना तजि, शरण जा गुरु प्यारे।
43गुरु को सुख चाहहु, न चाहहु, आपुनो सुख प्यारे।
44ध्यान करु आँसू बहा गहु, शरण गुरुवर प्यारे।
45गुरु की आज्ञा मानना ही, गुरु की सेवा प्यारे।
46रूठे हरि तो गुरु क्षमा कर, शास्त्र कह अस प्यारे।
47रूठे गुरु तो हरि क्षमा नहिं, करि सकत टुक प्यारे।
48पतित प्रिय गुरु, भक्त प्रिय हरि, भेद है बड़ प्यारे।
49शास्त्र ज्ञाता भी हो गुरु अरु, भक्त भी हो प्यारे।
50अष्ट सात्विक भाव जेहि तनु, भक्त है सोइ प्यारे।
51होके श्रद्धायुक्त गुरु की, शरण जाओ प्यारे।
52भाव हो माधुर्य हरि सों, श्याम सुख चह प्यारे।
53भक्ति हो रागानुगा अरु, कामना तजु प्यारे।
54रति समर्था धारि उर महँ, साधना करु प्यारे।
55ध्यान श्यामा श्याम को करि, करहु कीर्तन प्यारे।
56मिलन व्याकुलता बढ़ाओ, चाहो पिय सुख प्यारे।
57नाम अपराधों ते बचकर, भजन कर मन प्यारे।
58खाते-पीते चलते-फिरते, स्मरण करु हरि प्यारे।
59सर्वदा सर्वत्र ही करु, प्रेम हरि सों प्यारे।
60श्वास का विश्वास जनि करु, भजन करु द्रुत प्यारे।
61करिहौं करिहौं कहत बीते, जन्म अगनित प्यारे।
62ध्यान हरि गुरु को करहु यह, प्राण साधन प्यारे।
63वेद कह हरि आठ गुण तेहि, दें गुरुहिं हरि प्यारे।
64सृष्टि आदिक कर्म हरि कर, गुरुहिं ना दें प्यारे।
65जीव का चित शुद्ध कर गुरु, हरि ते गुरु अति प्यारे।
66भक्ति करु सासंग जामें, हरि स्मरण हो प्यारे।
67कर्म ज्ञानादिक रहित हो, भक्ति शुद्धा प्यारे।
68प्यार हरि गुरु में ही कर मन, और कहुँ नहिं प्यारे।
69जो बढ़े क्षण क्षण में सोई, प्रेम जानहु प्यारे।
70प्रेम बाढ़ै चन्द्र सम पै, “पूर्णिमा” नहिं प्यारे।
71प्रेमवश रह हरिहुँ हरि ते, प्रेम बड़ है प्यारे।
72शक्ति ह्लादिनि सार जो है, प्रेम सो है प्यारे।
73प्रेम तो है दिव्य तेहि चह, दिव्य मन ही प्यारे।
74सूर्य सम है प्रेम तम सम, कामना है प्यारे।
75कामना अरु प्रेम इक सँग, रहि सकत नहिं प्यारे।
76देना देना सीखना है, प्रेम जो चह प्यारे।
77दो विरोधी कर्म तेरे, बुद्धि पर है प्यारे।
78बिनु कृपा तव कौन जाने, तेरी महिमा प्यारे।
79गुरु कृपा करु बसहु उर पुर, अज्ञता हर प्यारे।
80हरि “कृपालु” हों तभी जब, कर कृपा गुरु प्यारे।