Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 842
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1होरी खेले हरि सों सो गोविंद राधे।
2जाके हृदय दिव्य प्रेम हो बता दे॥ 9807॥
3पिचकारी प्रेम की लै गोविंद राधे।
4भावरंग केसर हरि पै डला दे॥ 9808॥
5शुद्ध चित्त पिचकारी गोविंद राधे।
6माधुर्य भाव रंग हरि पै डला दे॥ 9809॥
7होरी आ रही है गोरी गोविंद राधे।
8माखन मलाई खा के देह बना दे॥ 9810॥
9बिनु खाये माखन गोविंद राधे।
10गोपी तोहिं एक धक्के में गिरा दे॥ 9811॥
11होरी में हारे हरि गोविंद राधे।
12आगे भागें हरि पाछे गोपी बता दे॥ 9812॥
13जा जा जा भगोड़े कान्ह गोविंद राधे।
14घर जा के तुरत कपाट लगा दे॥ 9813॥
15जा जा जा भगोड़े कान्ह गोविंद राधे।
16चुल्लू भर पानी में डुबकी लगा दे॥ 9814॥
17जा जा जा भगोड़े कान्ह गोविंद राधे।
18मैया ते कहु मोहिं चुरी पहिरा दे॥ 9815॥
19गोपी ने कहा देखो गोविंद राधे।
20छोरी ते हारि भागा छोरा बता दे॥ 9816॥
21गोपी ते हारा नाहीं गोविंद राधे।
22गोपी प्रेम ते हारा ब्रह्म बता दे॥ 9817॥
23भक्त वत्सल हरि गोविंद राधे।
24निज भक्त सुख हित भक्त को जिता दे॥ 9818॥