Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 398
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1प्रेम में नेम नाहिं गोविंद राधे।
2तोड़ने पड़ें टूट जायें बता दे॥ 4616॥
3प्रेम की मत्तता में गोविंद राधे।
4नियमों का बन्धन विघ्न बता दे॥ 4617॥
5हरि में अनन्त शक्ति गोविंद राधे।
6प्रेम शक्ति सब शक्तियों को हरा दे॥ 4618॥
7अपना सब दे दे गोविंद राधे।
8पुनि आपु को भी दे दे प्रेम बता दे॥ 4619॥
9आत्म समर्पण अर्थ गोविंद राधे।
10निज मन प्राण आदि दान है बता दे॥ 4620॥
11प्रेम माँगे सब कछु गोविंद राधे।
12तन मन धन सब अर्पन करा दे॥ 4621॥
13प्रेम सब कछु माँगे गोविंद राधे।
14हम कछु कछु ही दें कछु कछु ना दें॥ 4622॥
15मैं भी कछु कछु ही दूँ गोविंद राधे।
16वे भी कछु कछु ही दें सब कछु ना दें॥ 4623॥
17रो रो के दिव्य प्रेम गोविंद राधे।
18माँगना है बस तेरा काम बता दे॥ 4624॥
19प्रेम देना ना देना गोविंद राधे।
20यह तो काम प्रियतम का बता दे॥ 4625॥
21वे हैं हितैषी तेरे गोविंद राधे।
22जब हित देखेंगे देंगे बता दे॥ 4626॥
23कृष्ण बिनु कारण गोविंद राधे।
24करु णा वरु णालय हैं बता दे॥ 4627॥