Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 393
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1भक्ति अरु अभिमान गोविंद राधे।
2दोनों रहें एक ठौर ना बता दे॥ 4556॥
3प्रेमी जनों को गोविंद राधे।
4चार वृत्तियाँ अनिवार्य बता दे॥ 4557॥
5दीनता उदारता गोविंद राधे।
6सरलता अरु सहनशीलता बता दे॥ 4558॥
7दीनता अर्थ यह गोविंद राधे।
8मन की निरहंकारिता बता दे॥ 4559॥
9सब का सम्मान करो गोविंद राधे।
10सब के हैं उर बैठे कृष्ण बता दे॥ 4560॥
11नम्रता की सीमा देखो गोविंद राधे।
12पत्तल उठा के जूठी श्याम शिक्षा दे॥ 4561॥
13दीनता है जग निंद्य गोविंद राधे।
14किन्तु वही हरि प्रति हरि ते मिला दे॥ 4562॥
15दीनों के हैं दोनों गोविंद राधे।
16मन बुद्धि दोनों को दीन बना दे॥ 4563॥
17सब ज्ञान भूल जावो गोविंद राधे।
18आँसू बहाओ आँसू हरि को बुला दे॥ 4564॥
19“आद्यागमत्” मंत्र गोविंद राधे।
20रो के पुकारो हरि दरस दिखा दे॥ 4565॥
21रो के पुकारो उन्हें गोविंद राधे।
22भाजे भाजे आयेंगे मिलेंगे बता दे॥ 4566॥
23रो रो के बुलाये जा गोविंद राधे।
24कभू तो मिलेंगे हरि सब को बता दे॥ 4567॥