Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 385
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1हरि में न लागे मन गोविंद राधे।
2जनि कहु बार बार मन को लगा दे॥ 4460॥
3साधना लगाना मन गोविंद राधे।
4सिद्धि लग जाना मन हरि में बता दे॥ 4461॥
5प्रथम लगाना मन गोविंद राधे।
6पुनि मन लग जाना होगा बता दे॥ 4462॥
7हरि का तो है ही जीव गोविंद राधे।
8यह मान लेना ही हरि का बना दे॥ 4463॥
9तन मन धन सब गोविंद राधे।
10श्रीकृष्ण का है यह बुद्धि में बिठा दे॥ 4464॥
11जीव तो है कृष्ण दास गोविंद राधे।
12यह बात बार बार बुद्धि में बिठा दे॥ 4465॥
13श्याम स्वामी मैं दास गोविंद राधे।
14यह दृढ़ विश्वास हरि ते मिला दे॥ 4466॥
15किन्तु दृढ़ विश्वास गोविंद राधे।
16चित्त शुद्ध होने ते ही होगा बता दे॥ 4467॥
17हरि ही हैं जीव के गोविंद राधे।
18यह भाव नित्य हो तो हरि का बना दे॥ 4468॥
19हरि ही हैं तेरे यह गोविंद राधे।
20बार बार अभ्यास मन को करा दे॥ 4469॥
21मन तेरा हरि तेरा गोविंद राधे।
22मन को लगाना तेरा काम बना दे॥ 4470॥
23सर्पदष्ट व्यक्ति को गोविंद राधे।
24कड़ुवी नीम लगे मीठी बता दे॥ 4471॥