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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 382

Reading 393 of 516 · Source nos. 4424–4435 · Source PDF 399

1ऐसी सेवा को गोविंद राधे।

2रसिक प्रकट सेवा बतला दे॥ 4424॥

3मानसी सेवा है गोविंद राधे।

4मन ते ही करे जो सेवा बता दे॥ 4425॥

5प्रकट सेवा को गोविंद राधे।

6मन ते करे, सेवा मानसी बता दे॥ 4426॥

7मानसी सेवा ते गोविंद राधे।

8मन हो जाये एकाग्र बता दे॥ 4427॥

9प्रकट सेवा ते हो गोविंद राधे।

10मानसी सेवा श्रेष्ठ बता दे॥ 4428॥

11मानसी सेवा में गोविंद राधे।

12बाह्य नियम कछु नाहिं बता दे॥ 4429॥

13जहाँ कहीं जैसे भी गोविंद राधे।

14बने करे मन ते सेवा बता दे॥ 4430॥

15प्रकट या मानसी गोविंद राधे।

16सेवा में है भाव एक बता दे॥ 4431॥

17प्रकट में नियम है गोविंद राधे।

18मानसी में नहिं नियम बता दे॥ 4432॥

19बन्धन मोक्ष का गोविंद राधे।

20कारण एकमात्र मन है बता दे॥ 4433॥

21अतएव सेवा भी गोविंद राधे।

22मानसी ही करणीय बता दे॥ 4434॥

23वस्तुतस्तु मन की गोविंद राधे।

24भक्ति ही भक्ति है शास्त्र बता दे॥ 4435॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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