Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 351
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1सेवा को आज्ञा का गोविंद राधे।
2शत प्रतिशत पालन ही बता दे॥ 4052॥
3हरि गुरु सेवा है गोविंद राधे।
4तीन ही प्रकार की सबको बता दे॥ 4053॥
5मन ते स्मरण नित्य गोविंद राधे॥
6यह है मानसी सेवा बता दे॥ 4054॥
7मानसी सेवा की गोविंद राधे।
8सिद्धि हेतु तन धन सेवा बता दे॥ 4055॥
9मन की सेवा प्रमुख गोविंद राधे।
10साथ में तन धन को भी लगा दे॥ 4056॥
11सेवा तन धन ते हो गोविंद राधे।
12मन ते मिलन व्याकुलता बढ़ा दे॥ 4057॥
13हरि गुरु कृपा ते ही गोविंद राधे।
14मैंने कछु सेवा की यह भाव बना दे॥ 4058॥
15तन ते ना सेवा मिले गोविंद राधे।
16मन ते ही सेवा करो फल एक सा दे॥ 4059॥
17हरि गुरु प्रेम में ना गोविंद राधे।
18देरी हो ना दूरी हो मन को बता दे॥ 4060॥
19जग ते हटा के मन गोविंद राधे।
20बार बार हरि अरु गुरु में लगा दे॥ 4061॥
21जहाँ मन जाय तेरा गोविंद राधे।
22क्रोध जनि करो हरि गुरु को बिठा दे॥ 4062॥
23यत्र तत्र सर्वत्र गोविंद राधे।
24हरि गुरु सुमिरन मन ते करा दे॥ 4063॥