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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

मानव देह · पृष्ठ 74

Reading 86 of 516 · Source nos. 835–846 · Source PDF 91

1माना देह मायिक गोविंद राधे।

2किन्तु देह बिनु भक्ति हो न बता दे॥ 835॥

3हीरे ते हीरा कटे गोविंद राधे।

4ऐसे देह ते देहमुक्ति बता दे॥ 836॥

5नश्वर देह ते ही गोविंद राधे।

6अविनाशी हरि प्राप्त होते बता दे॥ 837॥

7देह का प्रकार तो है गोविंद राधे।

8लख चौरासी योनि बता दे॥ 838॥

9जीव को दिये हैं हरि गोविंद राधे।

10लख चौरासी भाँति वस्त्र बता दे॥ 839॥

11लख चौरासी में गोविंद राधे।

12नर योनि ही कर्म योनि है बता दे॥ 840॥

13नर चाहे स्वर्ग सुख गोविंद राधे।

14स्वर्ग सुर चाहें नर तनु दिलवा दे॥ 841॥

15वेदों में सुरों को गोविंद राधे।

16असुर कहा आश्चर्य बता दे॥ 842॥

17“असुषु रमंते इति” गोविंद राधे।

18व्युत्पत्ति सुर को असुर बता दे॥ 843॥

19असु अर्थ प्राण, सुर गोविंद राधे।

20प्राणों में ही करें रमण बता दे॥ 844॥

21नर के पलक चले गोविंद राधे।

22देव के पलक नहिं चलती बता दे॥ 845॥

23नर चले भू पै गोविंद राधे।

24देवों के पैर भू पै परें ना बता दे॥ 846॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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