Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
नीलमणि तनु लखि गइ बलिहार।
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2नीलमणि तनु लखि गइ बलिहार।
3त्रिभुवन सुन्दर कामदेव अरु, रति है उसकी नार।
4उनते अगनित गुनित मनोहर, हैं सुन्दर सरकार।
5उनकी सुंदरता उनके ही, मन को मोहनहार।
6उनकी चिन्मय तनु लखि ज्ञानिहूँ, मानत मुक्तिहिं खार।
7शिव, शुक, जनक, सनक तनु छवि लखि, देत समाधि बिसार।
8उमा, रमा, ब्रह्माणी, वाणी, लखि नहिं पतिव्रतधार।
9उनके रोम रोम ते संतत, बह ब्रज रस की धार।
10कह ‘कृपालु’ उन तनु रस चाखत, भल वृषभानु दुलार।
11भावार्थ:-एक सखी किसी दूसरी सखी से कहती है- हे सखी !
12श्यामसुन्दर के दिव्य शरीर के सौन्दर्य का दर्शन कर मैंने अपने तन
13मन, प्राण न्यौछावर कर दिये। त्रिभुवन में सबसे सुन्दर कामदेव
14और उसकी पत्नी रति हैं। उन दोनों से असंख्य गुना मनोहर श्यामसुन्दर
15हैं। श्यामसुन्दर का सौन्दर्य उनके ही मन को मोहित कर लेता है।
16उनके चिदानन्दमय शरीर का दर्शन कर ज्ञानी जन मुक्ति के सुख को
17खारा समझते हैं। शिव, शुक, जनक एवं सनकादिक नंदनंदन के
18शरीर की शोभा को देखकर समाधि-सुख को विस्मृत कर देते हैं।
19पार्वती, लक्ष्मी, सावित्री एवं सरस्वती श्री कृष्ण की सुन्दर छवि को
20निहार कर पातिव्रत-धर्म से विचलित हो जाती हैं नीलमणि के रोम
21रोम से निरन्तर ब्रज-रस की धारा प्रवाहित होती रहती है।
22पद के रचयिता के अनुसार श्री कृष्ण के शारीरिक-माधुर्य का
23आस्वादन भली प्रकार से श्री राधा रानी ही करती हैं।