Dainik Prarthana — source anthology; see printed contributor credits
साधक हेतु कतिपय स्मरणीय निर्देश
Reading 20 of 21 · Source PDF 34–36
1साधक हेतु कतिपय स्मरणीय निर्देश
21. सतर्क होकर साधना करने के लिए बैठो। यदि आलस्य आने
3लगे तो अपने आप खड़े हो जाओ। लेकिन शर्त यह है,
4चिन्तन श्यामसुन्दर का ही हो।
52. अपने इष्टदेव का गुणगान करो। ध्यान रखो, किसी का मन
6किसी के गुण पर ही रीझता है। जैसे संसार में कोई किसी
7के गुण पर ही रीझता है। (सुन्दर रूप भी एक गुण है), इसी
8प्रकार अधम-उधारनहार, पतित-पावन, भक्त-वत्सल आदि
9ठाकुर जी के अनन्त गुण हैं। इन गुणों का निरन्तर चिन्तन
10करें।
113. केवल गुणगान करने से भी काम नहीं चलेगा। गान तो गवैये
12भी करते हैं, लेकिन उनको भगवत्प्राप्ति नहीं होती। अतएव
13गुणगान करते समय तदनुसार भाव भी लाओ। जैसे, हम
14वस्तुतः अधम हैं, पतित हैं, अनन्त जन्मों के किये अनन्त
15पापों की गठरी सिर पर लिये हैं और वे अकारण करुण,
16भक्त-वत्सल, पतित-पावन, अधम-उधारनहार आदि हैं।
174. हमें कीर्तन में नींद क्यों आती है? क्योंकि हम अपने इष्टदेव
18का रूपध्यान नहीं करते, श्यामसुन्दर को प्यार नहीं करते।
19प्यार नहीं है, इसलिये गुणगान करते समय हृदय नहीं पिघलता
20व हम ऊँघने लगते हैं।
215. नेत्र बन्द करके रूपध्यान करो, क्योंकि प्राथमिक अवस्था में
22आँखें खोलकर कीर्तन करने से दूसरे लोग आते जाते दिखाई
23देते हैं, श्यामसुन्दर नहीं। रूपध्यान की अत्यन्त आवश्यकता
24है। रूपध्यान नहीं करेंगे तो शारीरिक क्रिया का कोई फल
25नहीं मिलेगा।
266. ठाकुर जी का जैसा भी चाहें, रूपध्यान बना लें। बाल्यावस्था
27का, किशोर रूप का, युवावस्था का। ठाकुर जी उसी रूप में
28मिल जायेंगे। लेकिन भगवान् को पहले देखकर फिर रूपध्यान
29करने वाले नास्तिक बन जायेंगे, क्योंकि हमारी प्राकृत आँखें
30“प्राकृत राम” को देखेंगी, भगवान् राम को नहीं।
31““चिदानन्दमय देह तुम्हारी, विगत विकार जान
32अधिकारी””।
33अतः अधिकारी बनने के पूर्व देखने की बात न करो।
347. रूपध्यान करते हुए प्रिया प्रियतम के साथ जिस लीला में
35जाना चाहो, चले जाओ तथा उनके दिव्य मिलन व दर्शन के
36लिये अत्यन्त तड़पन पैदा करो। लाख आँसू बहाओ, लेकिन
37किसी भी आँसू को तब तक सच्चा न मानो, जब तक स्वयं
38श्यामसुन्दर आकर उसे अपने पीताम्बर से न पोंछ लें। इतनी
39व्याकुलता पैदा करो कि नेत्र और प्राणों में बाजी लग जाये।
40एक-एक पल युग के समान लगने लगे। लेकिन यदि
41प्राणवल्लभ न आयें तो निराशा न आने पाये, प्रेमास्पद में
42दोष बुद्धि न आने पाये।
438. पूर्ण लाभ लेने हेतु साधना समय के अतिरिक्त समय में गुरु
44एवं ईश्वर को साक्षी व अन्तर्यामी रूप में नित्य अपने साथ
45अनुभव करते हुए, मौन नियम का पूर्ण पालन करो।