Dainik Prarthana — source anthology; see printed contributor credits
श्री राधाकृष्णाभ्यां नमः
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1प्रार्थना
2श्री राधाकृष्णाभ्यां नमः
3श्री गुरवे नमः श्री गुरवे नमः श्री गुरवे नमः
4आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।
5न मर्त्यबुद्ध्याऽसूयेत सर्वदेवमयो गुरुः।।
6हे परम प्रियतम पूर्णतम पुरुषोत्तम श्री कृष्ण! तुम से विमुख
7होने के कारण अनादिकाल से हमने अनन्तानन्त दुःख पाये एवं
8पा रहे हैं। पाप करते करते अन्तःकरण इतना मलिन हो चुका है
9कि रसिकों द्वारा यह जानने पर भी कि तुम अपनी भुजाओं को
10पसारे अपनी वात्सल्यमयी-दृष्टि से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हो,
11तुम्हारी शरण में नहीं आ पाता।
12हे अशरण शरण! तुम्हारी कृपा के बिना तुम्हें कोई जान भी तो
13नहीं सकता। ऐसी स्थिति में, हे अकारण करुण! पतितपावन
14श्रीकृष्ण! तुम अपनी अहैतुकी कृपा से ही हमको अपना लो।
15हे करुणा सागर! हम भुक्ति-मुक्ति आदि कुछ नहीं माँगते, हमें
16तो केवल तुम्हारे निष्काम प्रेम की ही एकमात्र चाह है।
17हे नाथ! अपने विरद की ओर देखकर इस अधम को निराश न
18करो।
19हे जीवनधन! अब बहुत हो चुका, अब तो तुम्हारे प्रेम के बिना
20यह जीवन मृत्यु से भी अधिक भयानक है। अतएव
21प्रेम भिक्षां देहि, प्रेम भिक्षां देहि, प्रेम भिक्षां देहि।
22साकेत बिहारी श्री राघवेन्द्र सरकार की जय।
23वृन्दावन बिहारी श्री यादवेन्द्र सरकार की जय।
24श्रीमद्सद्गुरु सरकार की जय।
25जय जय श्रीराधे जय जय श्रीराधे जय जय श्रीराधे।