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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

मैं हूँ तेरा पिय तू प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

Reading 55 of 112 · Source no. 43 · Source PDF 96–98

1मैं हूँ तेरा पिय तू प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

2लँगर न मैं कोइ ऐरी गैरी नारी,

3जा जा जा जार बनवारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

4ब्रह्म नपुंसक कह श्रुति चारी,

5कोउ न बने तव प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

6तेरे मात पिता सुत नारी,

7कोउ नहिं कह श्रुति चारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

8तू का जाने रति रस नारी,

9तू ग्वारिया अनारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

10जहँ कहुँ लख तू सुन्दर नारी,

11कह तू ही मम प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

12तनु कारी करतूतिहुँ कारी,

13जानति सब ब्रज नारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

14मीठी बोल मोर ज्यों प्यारी,

15खाय सर्प विषधारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

16त्यों तव बोल सरस अति प्यारी,

17उर अति कपट बिहारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

18तो को दे ब्रजनारी सारी,

19“दारी के” कहि गारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

20तबहुँ “कृपालु” कहत तू प्यारी,

21पुनि दे मीठी गारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

22भावार्थ—श्रीकृष्ण ने बेधड़क होकर किसी गोपी से कहा-

23मैं तेरा प्रियतम हूँ। तू मेरी प्रेयसी है। गोपी ने श्रीकृष्ण की रसपूर्ण

24शब्दावली सुनकर उत्तर दिया-अरे नटखट! मैं कोई ऐसी वैसी स्त्री

25नहीं हूँ। तुम तो पराई स्त्रियों से प्रेम करते फिरते हो। मेरे निकट से

26चले जाओ। चारों वेद कहते हैं कि ब्रह्म तो न स्त्री है, न पुरुष, वह

27तो नपुंसक है। फिर नपुंसक की स्त्री बनना कौन स्वीकार करेगा?

28चारों वेद यह भी कहते हैं कि तुम्हारे न तो कोई माता-पिता हैं, न

29ही पुत्र अथवा स्त्री। तुम स्त्रियों की प्रेम-पिपासा को कैसे पूर्ण कर

30सकते हो? तुम तो गायों को चराना ही जानते हो। जहाँ कहीं भी

31किसी सुन्दर स्त्री को देखते हो तुम्हें लोभ उत्पन्न हो जाता है और

32उससे कहने लगते हो कि बस! तू ही तो मेरी प्रेयसी है। हे कृष्ण!

33तुम्हारा शरीर तो काला है ही, करतब भी काले ही हैं। सभी ब्रज-

34गोपियाँ तुमसे भली भाँति परिचित हैं। हे श्यामसुन्दर! तुम्हारी वाणी

35तो मोर की वाणी जैसी मधुर है परन्तु हृदय कुटिल है। मोर का

36आहार विष से युक्त सर्प ही तो होता है। इसी प्रकार से तुम्हारा भी

37हाल है। मुख से तो मधुर वचन बोलते हो परन्तु हृदय अत्यन्त

38कपट से परिपूर्ण है। समस्त ब्रजगोपियाँ तुम्हें “दारी के” कहकर

39गाली देती हैं। श्री कृपालुजी कहते हैं कि तुम्हारे ऊपर उनकी

40गालियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता अपितु उत्तर में कहते हो कि

41मुझे तेरी गाली बहुत मीठी लगती है; पुनः दे।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version