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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

चलु हट न लिपट लंपट, दउँ हेला जो नटखट।

Reading 44 of 112 · Source no. 32 · Source PDF 77–78

1चलु हट न लिपट लंपट, दउँ हेला जो नटखट।

2आवे लठ लै पति झट, लठ खाय शीश झटपट॥

3तू काहुहिं फोरे घट, तू काहुहिं चोरे पट।

4जब पकरन चह नटखट, है जाय अलक्षित झट॥

5छुपि जाय लतन नटखट, इकली लखि गूजरि नट।

6कह देहु दान दधि झट, न तु फोरउँ तव दधि घट॥

7पुनि इकली लखि नटखट, कह मानु मोहिं पिय झट।

8नहिं बोलूँ तो झटपट, भाजै लै चूनरि पट॥

9अब लौं रह बचि नटखट, अब पावहु फल लंपट।

10मैया पै जावूँ झट, मारे “कृपालु” तोहिं नट॥

11भावार्थ—श्रीकृष्ण के अटपटे व्यवहार से खीझकर कोई गोपी

12कहती है-अरे लम्पट! दूर हट। मुझसे मत लिपट। यदि मैं अभी

13जोर से आवाज लगाऊँगी तो मेरा पति लाठी लेकर आ जायगा।

14तुम्हारे सिर पर लाठी पड़ेगी। तुम किसी का घड़ा फोड़ते हो,

15किसी के वस्त्र चुराते हो। जब वह तुम्हें पकड़ना चाहती है, तब

16अदृश्य हो जाते हो। लताओं में शीघ्रता से छिप जाना तो तुम्हारे

17बायें हाथ का खेल है। हे नटखट! किसी गूजरी को एकान्त में पाते

18ही उससे दधि का दान माँगने लग जाते हो। यदि वह मना करती

19है तो उसका दही का घड़ा फोड़़ने को तैयार हो जाते हो। किसी

20ब्रज-गोपी को अकेला पाकर उससे प्रेम-प्रस्ताव रखते हो, यदि

21वह उत्तर में मौन हो जाती है तो उसकी चुनरी लेकर भाग जाते

22हो। गोपी कहती है-हे चंचल कृष्ण! अब तक तो मैंने कुछ नहीं

23कहा परन्तु अब तुम्हें अपने कर्म का फल भोगना ही पड़ेगा। अब

24मैं माता यशोदा से तुम्हारी करतूतें बताऊँगी। श्री कृपालुजी कहते

25हैं- तब वे तुम्हें अवश्य ही दण्ड देंगी।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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