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Yugal Ras

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प्रकाशकीय

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1प्रकाशकीय

2जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के अनुसार जीव का चरम

3लक्ष्य श्री कृष्ण का माधुर्य भाव युक्त निष्काम प्रेम प्राप्ति है तदर्थ

4श्रवण, कीर्तन और स्मरण तीन प्रकार की भक्ति का अभ्यास करना

5है। इन तीनों साधनों में भी स्मरण प्रमुख है। अतएव आचार्य श्री येन

6केन प्रकारेण तत्वज्ञान साधकों के मस्तिष्क में भरने के लिए

7परमव्याकुल रहते हैं जिससे उनकी प्रेम पिपासा उत्तरोत्तर तीव्र तीव्रतर

8तीव्रतम हो जाय। एतदर्थ नित्य नवीन नवीन रचनाओं की अमूल्य

9निधि देकर आचार्य श्री दुर्लभ युगल रस का वितरण कर रहे हैं।

10वर्तमान प्रकाशित पुस्तक“युगल-रस”में 100 पदों का संकलन

11किया गया है। दिव्य प्रेम से ओतप्रोत पदों में भक्ति संबंधी शास्त्रीय

12सिद्धांतों का निरूपण अत्यधिक सरस और रोचक है, सर्वसाधारण

13के लिये ग्राह्य है। इसके अतिरिक्त दैन्य, शृंगार और लीला संबंधी पद

14भी हैं।

15पाठक पढ़ने के बाद स्वयं ही अनुभव करेंगे कि वह ऐसे फल

16का आस्वादन कर रहे हैं जिसमें न गुठली है, न गूदा है। बस, रस ही

17रस है, पीने वाला होना चाहिये। युगल रस का यह तृतीय संस्करण

18अर्थ सहित प्रकाशित किया गया जिससे पाठक और अधिक लाभान्वित

19हुए। अब चतुर्थ संस्करण भी अर्थ सहित प्रकाशित किया जा रहा है।

20चतुर्थ संस्करण—राधा गोविंद समिति

21शरत्पूर्णिमा 17, अक्टूबर, 2005

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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