Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
तेरी ही तो हूँ मैं राधे, राधे राधे राधे।
Reading 101 of 119 · Source no. 90 · Source PDF 182–183
1तेरी ही तो हूँ मैं राधे, राधे राधे राधे।
2तेरी ही थी आगे भी रहूँगी तेरी राधे,
3यह प्रतीति उर राधे, राधे राधे राधे।
4तू ही मेरी गति तू ही मेरी मति राधे,
5तू ही मेरी रति है राधे, राधे राधे राधे।
6पतितन हित नहिं कहुँ कोउ राधे,
7पतितपावनी राधे, राधे राधे राधे।
8हौं हौं एक अकिञ्चन राधे,
9चरण शरण दे राधे, राधे राधे राधे।
10मम रसना तो माने राधे,
11लेय नाम तव राधे, राधे राधे राधे।
12पै यह मन नहिं माने राधे,
13कर मनमाना राधे, राधे राधे राधे।
14बहु विधि येहि समुझायेउँ राधे,
15हार्यो सब विधि राधे, राधे राधे राधे।
16तव माया मोह्यो मन राधे,
17बरजु याय तू राधे, राधे राधे राधे।
18है “कृपालु” मन ही तो राधे,
19कर्ता धर्ता राधे, राधे राधे राधे।
20भावार्थ—भक्त कहता है- हे श्री राधे! मैं एकमात्र
21तुम्हारी ही हूँ, तुम्हारी ही थी तथा सदा तुम्हारी ही रहूँगी। मेरे
22हृदय में यह विश्वास है कि एकमात्र तुम ही मेरी आश्रय स्वरूपा
23हो। तुम ही मुझे शुद्ध बुद्धि प्रदान करने वाली हो तथा तुम ही
24अमूल्य श्री कृष्ण-प्रेम का वितरण करने वाली हो। हे पतितों
25को पवित्र करने वाली राधे! पतितजनों के लिये तो कहीं भी
26कोई आश्रय दाता नहीं है। राधे! मैं सर्वथा अकिंचन हूँ; अतः
27अपने चरणों की शरण प्रदान करो। मैं जिह्वा से तो तुम्हारा नाम
28लेता हूँ परन्तु मन से मनमानी ही करता हूँ। मैं तो अनेक प्रकार
29से इस मन को समझाकर थक गया। तुम्हारी माया से मुग्ध हुए
30इस मन को मैं नहीं जीत सका। तुम ही इसे भय दिखाकर
31अपने आधीन कर लो। मन ही कर्ता, भोक्ता है। जब मन तुम्हारा
32बन जायेगा तो फिर मैं सदा के लिये कर्मबंधन से मुक्त होकर
33तुम्हारा ही बन जाऊँगा।