Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
नथवारी पर वारी, वारी वारी वारी।
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1नथवारी पर वारी, वारी वारी वारी।
2बहुरंगी मनि गन दुति वारी,
3कनक मुकुट छवि प्यारी, वारी वारी वारी।
4कारी घुँघुरारी अनियारी,
5वेणी सुमन सँवारी, वारी वारी वारी।
6शीशफूल सोहत सिर प्यारी,
7लर मुक्तन छवि न्यारी, वारी वारी वारी।
8सुघर चंद्रिका छवि अति प्यारी,
9सिर सेंदुर सुकुमारी, वारी वारी वारी।
10नासा नथ बेसर छवि न्यारी,
11कर्णफूल श्रुति प्यारी, वारी वारी वारी।
12दृग चितवनि मुख मुसुकनि प्यारी,
13लखि लखि पिय बलिहारी, वारी वारी वारी।
14कर करपत्र चुरी छवि न्यारी,
15करतल मेहँदी प्यारी, वारी वारी वारी।
16दोउ कर मणि कंकण दुति प्यारी,
17मुँदरिन दुति छवि न्यारी, वारी वारी वारी।
18मणिन मोतियन लर गर प्यारी,
19उर कंचुकि छवि न्यारी, वारी वारी वारी।
20रतन खचित किंकिनि धुनि प्यारी,
21नील वसन छवि न्यारी, वारी वारी वारी।
22युगल चरण पायल झनकारी,
23बिछुवनि छवि अति न्यारी, वारी वारी वारी।
24रोम रोम रस टपकत प्यारी,
25पिय सखि सँग बनवारी, वारी वारी वारी।
26अस “कृपालु” प्यारी छवि प्यारी,
27प्यारिहुँ वारी वारी, वारी वारी वारी॥
28भावार्थ—नासिका में सुन्दर नथ धारण करने वाली
29राधा की प्यारी छवि पर मैं बलिहार जाता हूँ। स्वर्णिम मुकुट में
30जड़ी हुई असंख्य रंगों वाली मणियों की द्युति की छवि अवर्णनीय
31है। काले रंग की घुँघराली केश-राशि की वेणी को पुष्पों से
32सुसज्जित किया गया है। प्यारी राधा के सिर पर शीशफूल नामक
33आभूषण शोभा प्राप्त कर रहा है, उसमें गुँथी हुई मोतियों की
34लड़ की छटा भी न्यारी ही है। सिर पर चन्द्रिका अनोखी शोभा
35से युक्त है। सिर के मध्य भाग में सिंदूर से माँग भरी गई है,
36नासिका में नथ एवं बेसर यथास्थान सुशोभित हैं। युगल कर्ण
37कर्णफूलों से शोभायमान हैं। नेत्रों की चितवनि एवं मुख की
38मंद मुस्कान को निहारकर प्रियतम बलिहार जाते हैं। युग करों
39करपत्र नामक आभूषण एवं चूड़ियाँ सुसज्जित हैं। करतल मेहँदी
40की अरुणिमा से युक्त हैं। दोनों हाथों में मणियों से जड़े हुए
41कंकण दमक रहे हैं। उंँगलियों में अँगूठियाँ जगमगा रही हैं।
42प्यारी राधा के कण्ठ में मणि एवं मुक्ता के हार हिल रहे हैं।
43वक्ष पर कंचुकी धारण किये हैं। श्री राधा का सूक्ष्म कटि-प्रदेश
44रत्नों से जटित किंकिणी से झंकृत हो रहा है। गोरे अंग पर
45नील वर्ण का परिधान है। युगल-चरणों में पायल की अद्भुत
46झनकार है। उंँगलियों के बिछुवों की शोभा का वर्णन कौन कर
47सकता है। प्यारी राधा के रोम रोम से रस की वर्षा होती रहती
48है। उस रस का पान श्यामसुन्दर सखियों सहित करते हैं।
49“कृपालु”कहते हैं- प्यारी राधा की ऐसी प्यारी छवि पर स्वयं
50राधा भी बलिहार जाती हैं।