लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

छिन छिन भज मन राधे, राधे राधे राधे।

Reading 82 of 119 · Source no. 71 · Source PDF 148–150

1छिन छिन भज मन राधे, राधे राधे राधे।

2ब्रह्मा विष्णु शंभु भज राधे,

3सनकादिक भज राधे, राधे राधे राधे।

4उमा रमा हूँ नित भज राधे,

5जनकादिक भज राधे, राधे राधे राधे।

6परमहंस शुकदेवहुँ राधे,

7मुर्छित हों सुनि राधे, राधे राधे राधे।

8अष्ट सखिन ललितादिक राधे,

9अष्टयाम भज राधे, राधे राधे राधे।

10ब्रज की सब ब्रजबनितनि राधे,

11काज करत भज राधे, राधे राधे राधे।

12ब्रह्म ज्ञानी ध्यानी राधे,

13ब्रज तरु बनि भज राधे, राधे राधे राधे।

14साधन सिद्ध मुक्त भज राधे,

15नित्य सिद्ध भज राधे, राधे राधे राधे।

16औरन की का कहिये राधे,

17ब्रह्म श्याम भज राधे, राधे राधे राधे।

18रूपध्यानयुत मुरलिहिँ राधे,

19गावत गुन गन राधे, राधे राधे राधे।

20शरणागत पतितन कहँ राधे,

21पावन कर द्रुत राधे, राधे राधे राधे।

22मन “कृपालु” तू भी भज राधे,

23भुक्ति मुक्ति तज राधे, राधे राधे राधे॥

24भावार्थ—भक्त कहता है- हे मेरे मन! तू क्षण क्षण

25श्री राधा माधुरी (नाम, रूप, लीला, गुण, धाम आदि) का ही

26अवलम्बन ले। साधारण जीव की तो बात ही क्या- स्वांश-

27ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी निरन्तर श्री राधा के ही चरणों का

28चिन्तन करते हैं। सनकादि ब्रह्मर्षि गण भी श्री राधा के शरणागत

29रहते हैं। शिव की शक्ति उमा, विष्णु की अर्धांगिनी लक्ष्मी भी

30श्री राधा शक्ति पर आधारित हैं। विदेह जनक ने भी सीता के

31रूप में श्री राधा का ही लालन किया। परमहंस शुकदेव भी

32निरन्तर समाधि में अपने मन को लीन कर श्री राधा चरणाम्बुज

33की ही उपासना करते हैं। अंगभूता ललितादिक अष्ट सखियाँ

34निरन्तर निशिदिन श्री राधा का ही सेवन करती हैं। ब्रज में

35अवतीर्ण हुई ब्रज गोपियों ने भी अपने जीवन में इसी आदर्श

36की स्थापना की-““या दोहने वहनने-----।””ब्रह्मज्ञानियों एवं

37ध्यान योगियों ने ब्रज में वृक्ष बनकर श्री राधा की आराधना

38की। जो साधना द्वारा सिद्ध बने हैं तथा जो जीवन्मुक्त पुरुष हैं,

39वे भी अपनी गति मति श्री राधा पादारविंद में अर्पित कर उनका

40स्मरण, वंदन करते हैं। नित्य सिद्ध जन भी श्री राधा शक्ति की

41उपासना करते हैं। सर्वेश्वर श्री कृष्ण भी प्राणाधिष्ठात्री देवी श्री

42राधा के चरणों की शरण ग्रहण करते हैं तब अन्य किसी के

43लिये श्री राधा महारानी की शरण के अतिरिक्त और क्या अवलम्ब

44हो सकता है? प्राणों के प्राण श्री कृष्ण श्री राधा की रूप माधुरी

45का सतत् चिंतन करते हुए अपनी मोहिनी मुरली में प्रिया राधा

46के दिव्य गुण-गणों का गान करते हैं। करुणामयी राधा अपने

47शरणागत पतितों को अविलम्ब पावन बना लेती हैं।“कृपालु”

48कहते हैं कि हे मेरे मन! तू ब्रह्मलोक पर्यन्त के अल्प सुखो की

49कामना का परित्याग कर तथा मुक्ति-सुख को भी तजकर श्री

50राधा का स्मरण कर।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version