Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
चंचल चल हट तजु अंचल पट,
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1चंचल चल हट तजु अंचल पट,
2तू तो सब सों ही कर खटपट नटखट।
3तेरे रोम रोम भरो है कपट नटखट,
4तोहिं लोक लाज डर नहिं नेकु निपट।
5काउ ब्रजगोरी को तू फोरे काँकरि घट,
6काउ ब्रजगोरी को तू तोरे लर नटखट।
7काउ घर चोरे तू तो माखन नटखट,
8तोय पकरि न पावे कोउ भाजे झटपट।
9कभु पकरि जो पाये तोहिं कोउ नटखट,
10कछु जादू करि बनि जाय वाको पति झट।
11मारे तकि तकि दृग बानन नटखट,
12काउ चुनरि उतारे फारे कंचुकि पट।
13तेरी माया से तो हारे विधि हरि हर नट,
14तोहिं जाने सोइ जाको तू जनाये नटखट।
15तोरे गुरु दुर्वासा ने बताया नटखट।
16तू है हरि अवतारी आया धरि तनु नट।
17हम मानें नहिं तोहिं अवतारी नटखट,
18हम मानें तोहिं निलज निपट लम्पट।
19इतने में आये जाने कित ते “कृपालु” झट,
20बोले प्रेम की कुटिल गति अति अटपट।
21भावार्थ— किसी ब्रजगोपी ने श्रीकृष्ण से प्रेम की
22अटपटी भाषा में कहा-अरे चंचल! दूर हटो। मेरे वस्त्र को
23छोड़ दो। हे नटखट! तुम्हारे लिये मैं अकेली तो हूँ नहीं तुम तो
24सभी गोपियों के साथ प्रेम की खींचातानी करते रहते हो। तुम्हारे
25प्रत्येक रोम में छल-छिद्र भरा है। न तो तुम संसार की मर्यादा
26को ही मानते हो, न तुम्हें किसी का लेशमात्र भय है। जब कोई
27ब्रजगोपी यमुना तट पर जल भरने जाती है, तब तुम कंकड़
28मारकर उसका घड़ा फोड़ देते हो। कभी किसी के गले की
29माला तोड़ देते हो। अरे कृष्ण! तुम किसी गोपी के घर जाकर
30उसका माखन चुराते हो। यदि कोई गोपी तुम्हें पकड़ना चाहे तो
31बड़ी शीघ्रता से भाग जाते हो। यदि कदाचित् कभी किसी ने
32पकड़ भी लिया तो योगमाया द्वारा उसके पति का रूप धारण
33कर लेते हो। यदि कोई गोपी तुमसे उदासीन रहती है तो नेत्रों
34के कटाक्षपात से उसे घायल कर अपने वशीभूत कर लेते हो।
35किसी के सिर से चुनरी उतारकर कंचुकी फाड़ देते हो। हे
36अद्भुत नट! तुम्हारी विचित्र माया से तो सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, विष्णु
37एवं शिव भी पराजित हो गये। हे नटखट! कोई तुम्हें जान भी
38तो नहीं सकता। जिसे तुम स्वयं को जनाना चाहो, वही तुम्हें
39जान सकता है।““सोइ जानइ जेहि देहु जनाई””।तुम्हारे गुरु दुर्वासा
40द्वारा ज्ञात हुआ कि तुम ही अवतारों के अवतारी श्री हरि हो।
41मानव शरीर धारण कर जगत्-कल्याण के निमित्त ही तुम अपना
42दिव्य धाम त्यागकर हमारे मध्य आये हो। इतना सब तो सत्य
43है परन्तु गोपियाँ तुम्हारे भगवान् रूप को स्वीकार नहीं करती।
44गोपियाँ तो तुम्हें लम्पट ही मानती हैं। इसी बीच कहीं से
45“कृपालु” ने आकर कहा- प्रेम की अटपटी गति अत्यन्त ही
46टेढ़ी है।