Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कोउ सखि कान्हा ढिग जा ना, जा ना जा ना जा ना।
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1कोउ सखि कान्हा ढिग जा ना, जा ना जा ना जा ना।
2औचक मिले कतहुँ यदि कान्हा,
3घूँघट पटहिं हटा ना, जा ना जा ना जा ना।
4जब सो लखइ और दिशि कान्हा,
5तब तू लखु छवि कान्हा,जा ना जा ना जा ना।
6जो तोसों कछु बोले कान्हा,
7जनि बोलहु हाँ या ना, जा ना जा ना जा ना।
8सब कछु सहि ले जो कर कान्हा,
9पै दृग दृगन मिला ना, जा ना जा ना जा ना।
10झूठहिं कहु हौं ब्याही कान्हा,
11लठधारी पति कान्हा, जा ना जा ना जा ना।
12ले निकारि मम पति तव कान्हा,
13सब ठकुराई कान्हा, जा ना जा ना जा ना।
14नहिं डर पिटने ते कह कान्हा,
15मम तनु बज्र समाना, जा ना जा ना जा ना।
16अब नहिं छोड़े पाछा कान्हा,
17जो चहु करु कह कान्हा, जा ना जा ना जा ना।
18यह “कृपालु” साँचो पिय कान्हा,
19वेद पुरान बखाना, जा ना जा ना जा ना।
20भावार्थ—भक्त अपनी अटपटी भाषा में कहता है-
21कोई भी सखी कभी भूलकर भी कन्हैया के निकट न जाना।
22यदि कभी अचानक वह मिल भी जाय तो अपने घूँघट को मुख
23से हटाना मत। यदि कन्हैया को देखने की इच्छा हो तो जब
24वह किसी और दिशा की तरफ देखे तब तू उसकी मनोहर मूर्ति
25का दर्शन कर लेना। यदि कन्हैया तुझसे कुछ बोलना चाहे तो
26उसकी किसी भी बात का उत्तर हाँ या ना में मत देना। कन्हैया
27के नटखटपने को सह लेना परन्तु उसके नेत्रों से नेत्र मत मिलाना।
28कन्हैया से तू झूठ बोलकर अपने को विवाहिता बता देना और
29उसे यह कहकर सावधान कर देना कि मेरा पति लठैत है।
30कन्हैया से कह देना कि मेरा पति तुम्हारी सारी ठकुराई भुला
31देगा। कन्हैया ने सखी की उपर्युक्त बातें सुनकर कहा मुझे
32पिटने का भय नहीं है क्योंकि मेरा शरीर वज्र के समान है।
33प्रेमी कन्हैया ने अपने सहज स्वभाव का परिचय देते हुए कहा-
34मैं जिसे एक बार पकड़ लेता हूँ फिर कभी नहीं छोड़ता, अतः
35मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। तू मेरे साथ चाहे जैसा व्यवहार कर।
36“कृपालु”कहते हैं-सभी जीवों के सच्चे पति तो एकमात्र श्री
37कृष्ण ही हैं। ऐसा वेद पुराण बार बार पुकार पुकार कर कह रहे
38हैं।