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प्राक्कथन
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1प्राक्कथन
2हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्।
3कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥
4कलियुग में भगवन्नाम, गुण, लीलादि संकीर्तन ही
5भगवत्प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है। “युगल माधुरी” दिव्य
6युगल श्री राधा कृष्ण के नाम, गुणादि से सम्बन्धित
7संकीर्तनों का संग्रह है। भुक्ति एवं मुक्ति की कामनाओं से
8रहित होकर, हरि गुरु का रूपध्यान करते हुये, उनसे
9अत्यन्त दीनतापूर्वक, रोकर, दिव्य प्रेम की याचना करने
10से ही अंतःकरण शुद्ध होगा। तब गुरु-कृपा से दिव्य प्रेम
11की प्राप्ति होगी, जिससे श्री राधा-कृष्ण की नित्य सेवा
12का अधिकारी बन कर जीव सदा-सदा के लिये कृतार्थ
13हो जायगा। उसी लक्ष्य को लेकर ये सब संकीर्तन बनाये
14गये हैं।
15जगद्गुरु कृपालु महाराज