Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मेरे एक तुम, मेरे एक तुम, मेरे एक तुम माधव।
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1मेरे एक तुम, मेरे एक तुम, मेरे एक तुम माधव।
2मैं भी तो तव, मैं भी तो तव, मैं भी तो तव माधव।
3हौं न चह बैकुण्ठ नहिं चह, भुक्ति मुक्तिहुँ माधव।
4भक्ति चह अनपायिनी अरु, सेवा चह तव माधव।
5माना मैं अति पतित तुम भी, पतित-पावन माधव।
6मैं न भूलूँ तोहिं तुमहूँ, भूलो जनि मोहिं माधव।
7तुम भुला दो मोहिं भल हौं, तोहिं न भूलूँ माधव।
8तेरी दासी का है सुत मन, वाय मोहहु माधव।
9तुच्छ मन नहिं मोह सक कत, मदनमोहन माधव।
10मोहिं मोहहु या बदल दो, नाम मोहन माधव।
11तोरा पाछा अब न छोडूँ, चाहे जो हो माधव।
12प्यार करु या मारु हौं नहिं, तोहिं तजिहौं माधव।
13और जो हो ठौर पतितन, हित बता दो माधव।
14दान ते धन बढ़त याते, प्रेम दे दो माधव।
15तुम तो थे बिनु हेतु दाता, कृपण क्यों भये माधव।
16क्या मेरे पापों ते डर गये, पतित-पावन माधव।
17मुझ पतित ने नाम दिये तोहिं, पतित पावन माधव।
18मोहिं अपनो सोच नहिं कछु, सोच तुम्हरो माधव।
19बेर जो करिहौ तो सब जग, निठुर कहिहँहिं माधव।
20मैं हठी हूँ एक दिन तोहिं, आना होगा माधव।
21जो न आना हो तो आके, साफ कह दो माधव।
22जो न आवो तो मुरलि धुनि, ही सुना दो माधव।
23आ न आ वह वेदना दो, जो दी गोपिन माधव।
24रोना दे दो मोहिं तुम लो, मुस्कुराना माधव।
25मोसों तोसों नात अगनित, मानु कोउ इक माधव।
26तुमहि स्वामी तुम सखा हो, तुमहि सुत पति माधव।
27तुमहि माता, तुम पिता हो, तुमहि भ्राता माधव।
28बुद्धि माने, मन न माने, तू ही मनवा माधव।
29तुम तो मनमोहन कहावो, मोहो मम मन माधव।
30तुम हो अशरण शरण दो मोहिं, शरण चरनन माधव।
31तुम हो अंशी अंश हूँ मैं, दूर पुनि क्यों माधव।
32अंश हूँ सुख का, न पाया, अंश सुख का माधव।
33दासता अधिकार मेरो, काहे छीन्यो माधव।
34ओर हमरी नाहिं लखु लखु, ओर अपनी माधव।
35खरे को तो सब निभावें, खोटे को तुम माधव।
36जो न हों खोटे खरों को, कौन पूछे माधव।
37मैं हूँ तोरी प्रेयसी तुम, मेरे धव हो माधव।
38जानती हूँ चोरी चोरी, प्यार कर तुम माधव।
39पूछता जग नाम पिय का, का बताऊँ माधव।
40लखत आपुन रूप आपुहिं, भये मोहित माधव।
41जनक सनकादिक लखत तोहिं, भये मोहित माधव।
42तुम रसिक हो, रस भी तुम हो, भ्रमर मधु ज्यों माधव।
43जासु डर डर डर सोई डर, मातु साँटी माधव।
44जीव जसुमति गोद हित लखु, भूमि लोटत माधव।
45देत गारी वनचरिन तोहिं, “दारी के” कहि माधव।
46मेरा तो “मैं” भी नहीं है, तोहिं का दूँ माधव।
47मेरा मन प्राकृत है एहि लै, क्या करोगे माधव।
48शरण जाना कठिन कितनो, जीव बनि लखु माधव।
49तुम भी चेतन हम भी चेतन, भेद नहिं है माधव।
50तुम सनातन हम सनातन, भेद नहिं है माधव।
51मोमें तोमें भेद भी नहिं, भेद भी है माधव।
52तुम हो विभु चित्, हम हैं अणु चित्, भेद यह है माधव।
53तुम हो शासक शास्य हैं हम, भेद यह है माधव।
54सर्ववित तुम, अल्पवित हम, भेद यह है माधव।
55तुम हो प्रेरक, प्रेर्य हैं हम, भेद यह है माधव।
56तुम हो मायाधीश मायाधीन हैं हम माधव।
57तुम कृपालू स्वारथी हम, भेद यह है माधव।
58तुम हो भर्ता भृत्य हैं हम, भेद यह है माधव।
59तुम हो व्यापक व्याप्य हैं हम, भेद यह है माधव।
60तुम हो स्रष्टा सृज्य हैं हम, भेद यह है माधव।
61तुम हो निर्गुण हम गुणी हैं, भेद यह है माधव।
62तुम हो सूरज किरण हैं हम, भेद यह है माधव।
63तेरा आदि न, तेरा अंत न, तू सनातन माधव।
64तेरा भीतर, तेरा बाहर, दोनों ही नहिं माधव।
65तेरा पूर्व न, तेरा पर भी न, ऐसा तू है माधव।
66जग के भीतर, जग के बाहर, तू रहत नित माधव।
67जग के पूरब, जग के पश्चात्, तू ही रह इक माधव।
68योगमाया अर्थ “मा” का, “मा का धव” तू माधव।
69भक्ति बिनु अपनावो तो तुम, हो “कृपालु” माधव।