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Krishna Dwadashpadi

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

श्याम में आठ सुगंधि बताय।

Reading 13 of 13 · Krishna · Source no. 12 · Source PDF 24–25

1१२

2श्याम में आठ सुगंधि बताय।

3प्रथम सुगंधि दिव्य मुख की जो, सनक समाधि भुलाय।

4दूजी लेपित तनु हरि चंदन, की सुगंधि फैलाय।

5हरि चंदन कुंकुम मिश्रित हूँ, एक सुगंधि कहाय।

6एक सुगंधि एक कुंकुम की, रसिक जनन बतलाय।

7बनमाला में गुथी तुलसिका, की सुगंधि इक आय।

8अन्य वन्य फूलों की माला, इक सुगंधि कहलाय।

9मुख सुगंधि सों मिलि सुगंधि सब, इक सुगंधि बनि जाय।

10यह ‘कृपालु’ सौगंध्य अष्ट नित, श्यामा में भी भाय।

11भावार्थ:-श्यामसुंदर के दिव्य शरीर में से आठ प्रकार की सुगंधियां

12निःसृत होती रहती हैं। प्रथम प्रकार की सुगंधि तो उनके मुख-

13कमल की ही है, जिसे ग्रहण कर सनकादि अपनी समाधि भूल

14जाते हैं। दूसरी सुगंधि हरिचंदन की है, जिसका लेप श्रीकृष्ण के

15शरीर पर किया गया है। एक सुगंधि हरि चंदन मिश्रित कुमकुम की

16है। एक सुगंधि केवल कुमकुम की है। एक सुगंधि वनमाला में

17गूंथी हुई तुलसी की है। कण्ठ में धारण की हुई वन्य पुष्पों की

18माला की भी एक सुगंधि है। ये समस्त सुगंधियां मुख की सुगंधि से

19मिलकर एक सुगंधि और बन जाती है। ये अष्ट सुगंधियां श्रीराधा

20में भी नित्य निवास करती हैं।

Twelve complete source-numbered Krishna verses and their published Hindi meanings from the supplied 25-page Hindi source. This edition contains verse 6, which is absent from the supplied combined English scan.

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