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Krishna Dwadashpadi

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

नीलमणि वक्षःस्थल बलिहार ।

Reading 11 of 13 · Krishna · Source no. 10 · Source PDF 20–21

1१०

2नीलमणि वक्षःस्थल बलिहार ।

3वक्ष दाहिने बायें हैं दो, रोम राजि रिझवार।

4दक्षिण रोम राजि को सब बुध, जन श्री वत्स पुकार।

5बायें रोम राजि लक्ष्मी को, नित्य निवास निहार।

6इन दोउन के मध्य विप्रवर, भृगु मुनि के पद धार।

7कटि तट कछी काछनी छवि लखि, सनक समाधि बिसार।

8पुनि कमनीय कनक किंकिनि कटि, रुन झुन धुन विस्तार।

9मिलि ‘कृपालु’ भूषन रत्नन दुति, तनु दुति दमक अपार।

10भावार्थ:-कृष्ण के वक्षःस्थल की अद्भुत शोभा का वर्णन करते हुए

11रसिक संत कहते हैं- मैं नंदनंदन के वक्षस्थल की विचित्र छवि पर

12बलिहार जाता हूं। अत्यन्त सौन्दर्य शाली वक्षःस्थल के दाहिने एवं

13बाम भाग में दो रोमावली शोभित हैं। दांयें भाग की रोमावली को

14सभी श्रीवत्स रूप में जानते हैं। वाम भाग की रोमावली को लक्ष्मी

15देवी का नित्य निवास स्थल माना गया है। इन दोनों रोमावलियों के

16मध्य ब्राह्मण-श्रेष्ठ भृगु मुनि के चरण-चिन्ह सुशोभित हैं। कटि-

17प्रान्त में सुघरता से बांधी गई दिव्य वस्त्र की काछनी को देखकर तो

18सनकादि अपनी समाधि को ही विस्मृत कर बैठे। स्वर्ण-मेखला

19की रुनझुन ध्वनि कटि-प्रान्त की कमनीयता का विस्तार कर रही

20है। नंदनंदन के दिव्य आभूषणों के रत्नों की द्युति से उनके शरीर

21की दमक द्विगुणित हो उठी है।

Twelve complete source-numbered Krishna verses and their published Hindi meanings from the supplied 25-page Hindi source. This edition contains verse 6, which is absent from the supplied combined English scan.

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