Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
श्याम सिर मुकुट लटक बलिहार।
Reading 5 of 13 · Krishna · Source no. 4 · Source PDF 8–9
1४
2श्याम सिर मुकुट लटक बलिहार।
3चिन्मय नाना मणिन अलंकृत, कनक मुकुट सिरधार।
4रंग बिरंगे मणिन रंग मिलि, झिलमिल करत लिलार।
5रंग बिरंगी मोतिन लर पुनि, लिपटी मुकुट निहार।
6चमचमात सिर मुकुट मध्य कर, पंख मयूर विहार।
7मुख पर परत मुकुटमणि मुक्तन, रंग चमक छविदार।
8लखि ‘कृपालु’ सिर मुकुट करोरन, इन्द्रधनुष दऊँ वार।
9भावार्थ:-संत कवि कहते हैं- अपने आराध्य श्यामसुन्दर के मस्तक
10पर धारण किये हुए अद्भुत मुकुट की लटक पर मैंने अपना मन,
11प्राण सब कुछ वार दिया। श्यामसुन्दर के आभूषण उनकी भाँति ही
12चेतन हैं। दिव्य मणियों से जटित स्वर्ण के मुकुट की शोभा विचित्र
13है। विविध रंग के मणियों का रंग परस्पर मिलकर मस्तक को
14दैदीप्यमान कर रहा है। उस मणि-मुकुट में अनेक रंगों की मोतियों
15की लड़ लिपट रही है। मस्तक के चमकते हुए मुकुट के मध्य में
16मयूर पंख लहरा रहा है। स्वर्ण के मुकुट की मणियों एवं मोतियों
17का विविध रंग बिरंगा प्रकाश मुख पर पड़ रहा है। भक्त कवि
18नंदनंदन के शीश के मुकुट पर करोड़ों इन्द्रधनुषों की शोभा न्यौछावर
19करते हैं।