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प्रेम रस मदिरा

Madhuri 1 · pad 1/6 · no. 1

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सद्गुरु-माधुरी

Pad 1 · collection no. 1

Original pad by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

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Original page 1

हिन्दी · मूल पद

अस रस महँ, मोहिं सद्गुरु बोरी।

धर्म अर्थ अरु काम मोक्ष रस, सबै लगत मो फीको री।

कहँ लौं कह बैकुण्ठ-लोकहूँ, रुचि नहिं टुक सपनेहुँ मोरी।

इक भावत चंचल नँदनंदन, इक वृषभानुलली भोरी।

गिरिजा-अजा जलधिजा-दुर्लभ, पियत रास रस ब्रजखोरी।

कह “कृपालु” अस सद्गुरु ऋण ते, उऋण न कोटि कल्प को री॥

प्रेम रस मदिरा0001

सद्गुरु-माधुरी, pad 1, collection no. 1