सद्गुरु-माधुरी
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Original pad by Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
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हिन्दी · मूल पद
अस रस महँ, मोहिं सद्गुरु बोरी।
धर्म अर्थ अरु काम मोक्ष रस, सबै लगत मो फीको री।
कहँ लौं कह बैकुण्ठ-लोकहूँ, रुचि नहिं टुक सपनेहुँ मोरी।
इक भावत चंचल नँदनंदन, इक वृषभानुलली भोरी।
गिरिजा-अजा जलधिजा-दुर्लभ, पियत रास रस ब्रजखोरी।
कह “कृपालु” अस सद्गुरु ऋण ते, उऋण न कोटि कल्प को री॥