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      "heading": "श्री राधे जू की अनुपम झाँकी | भक्ति चैलेंज 81",
      "title": "श्री राधे जू की अनुपम झाँकी",
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            "हमारे मन भाईं भानुलली।",
            "भरी गुमान दिवानी डोलति, जानत जग पगली।",
            "लोक-वेद-कुल कानि तजी सब, लोग कहेँ विटली।",
            "कर्म अकर्म विकर्म आदि की, विपदा आपु टली।",
            "राधे नाम सरस-रस चाखत, अमृत मधुर डली।",
            "विहरति नित 'कृपालु' स्वामिनि सँग, गहवर-कुंजगली॥"
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            "धरो मन, भानुलली को ध्यान।",
            "जाको ध्यान धरत निशिवासर, सुंदर श्याम सुजान।",
            "कनक मुकुट सिर चारु चंद्रिका, तापर लर मुक्तान।",
            "चूनरि जरिन किनार गौर तनु, नीलांबर परिधान।",
            "श्रुति ताटंक गुंथी वर वेणी, लजवति भौंह कमान।",
            "नासा भल मुक्ताहल सोहति, मन मोहति मुसकान।",
            "पग पायल गति अति अभिरामिनि, लखि मराल सकुचान।",
            "पाय 'कृपालु' सरस अस स्वामिनि, चरन न कस लपटान॥"
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      "heading": "गुरु ही हैं हरि | भक्ति चैलेंज 82",
      "title": "गुरु ही हैं हरि",
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            "अरे मन! हरि, हरिजन नहिं दोय।",
            "जहँ हरि तहँ हरिजन, जहँ हरिजन, तहँ हरि विलग न होय।",
            "दोऊ रहत दास दोउन को, मरम न जाने कोय।",
            "दोउ कर पर उपकार निरंतर, पतितन-मन मल धोय।",
            "जल, तरंग दोउ नाम उपाधी, वस्तुतस्तु इक सोय।",
            "पै 'कृपालु' हरिजन रूपी हरि, ही सों स्वारथ तोय॥"
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            "पीर हरि! तुम बिनु कौन हरे?।",
            "दैहिक दैविक भौतिक तापन, अब लौं बहुत जरे।",
            "लख चौरासी योनि चराचर, बहु विधि स्वाँग धरे।",
            "मृग मृगजल ज्यों धाय रैन दिन, इंद्रिन घट न भरे।",
            "छिन छिन बाढ़ति जाति वासना, ज्यों घृत अगिनि परे।",
            "नर तनु पाय 'कृपालु' चेत न तु, परि भवकूप मरे॥"
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      "title": "हरि-गुरु शरणागति",
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            "जयति जय, जय सद्गुरु महराज।",
            "छके युगल रस रास सरस जनु, मूर्तिमान रसराज।",
            "बिनु कारण करुणाकर जाकर अस स्वभाव भल भ्राज।",
            "बरबस पतितन देत प्रेमरस, अस रसिकन सरताज।",
            "डूबत आपु डुबावत जन कहँ, प्रेमसिंधु-ब्रजराज।",
            "हौं 'कृपालु' गुरुचरण शरण गहि, भयो धन्य जग आज॥"
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            "नाथ! अब भटकत थकि गये पाम।",
            "पुनि पुनि जनमि जनमि दुख पायो, नहिं पायो विश्राम।",
            "जूते लात खात पति वनितनि, नहिं अबहूँ उपराम।",
            "पढ़त सुनत जानत मानत पै, मन ठानत हठ बाम।",
            "यद्यपि तव लीला गुन गावत, लेत तुम्हारोइ नाम।",
            "तदपि 'कृपालु' कृपालु कृपा बिनु, छुटै न इंद्रिन काम॥"
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          "text": "पद संख्या 1.2, सद्गुरु माधुरी"
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            "अरे मन! सुन गुरु-तत्व-विचार।",
            "'गुं रौतीति गुरुः', व्युत्पत्तिहिँ, गुरु मेटत अँधियार।",
            "यद्यपि गुरु-गोविन्द दोउ इक, कह वेदादि पुकार।",
            "दोउन महँ कोउ मिलइ मिलइ तब, प्रेम-सुधा-रससार।",
            "तदपि रहस्य सुनहु मन! गुरु बिन, मिलइ न नंदकुमार।",
            "पै 'कृपालु' बिनु हरिहिँ मिलइ गुरु, जय सद्गुरु सरकार॥"
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            "मेरो मन गौर चरन अनुराग्यो।",
            "सोवत रह्यों अनादि काल ते, रसिक कृपा ते जाग्यो।",
            "मिट्यो स्वप्न संसार आपुहीं, मोह तिमिर सब भाग्यो।",
            "बिनु अष्टांग योग साधे ही, चित्त प्रेम रस पाग्यो।",
            "छुटत न कोटि मुक्ति सुख पाये, जेहि मुख यह रस लाग्यो।",
            "भयो 'कृपालु' धनी सब दिन को, मिल्यो रतन मुहँ माँग्यो॥"
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            "करिय मोहिँ कुंज कदंबनि डार।",
            "जिनमें झूला डारि युगलवर, झूलैं कुंज मझार।",
            "कबहुँक झोंटा देंय लाल जू, कबहुँ देंय ब्रजनार।",
            "झूलूँ लाल लली सँग हौं हूँ, झुकि झुकि झूमि निहार।",
            "प्यारी प्रीतम पर ऊपर ते, करौं पुष्प बौछार।",
            "लखत 'कृपालु' युगल झांकी नित, ह्वै जाऊँ बलिहार॥"
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            "युगलवर, झूलनि की बलिहार।",
            "नागरि अरु नागर झुकि झूमत, भल गलबाँहीं डार।",
            "उमड़ि घुमड़ि घन गरजत चमकति, चपला बारम्बार।",
            "पंचम सुर सों तान अलापति, गावति सखिन मलार।",
            "गावत ही घन बरसन लागे, भीजत दोउ सरकार।",
            "धनि 'कृपालु' सो बाँकी झाँकी, धनि जिन ताहि निहार॥"
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