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            "नन्ददुलारे, राधा जू के प्यारे, प्राण हमारे, जाऊँ तिहारी बलिहार।",
            "सुन्दरताहूँ जासु लजाई, ललित त्रिभंगी छवि मो मन भाई।",
            "नैन रतनारे, मैन मदमारे, सैन मनहारे, छविनिधि नन्दकुमार।",
            "तरु-तमाल श्यामल-तनु धारी, राधा-मानस-हंस-मुरारी।",
            "कारे कारे, अति अनियारे, कच घुँघरारे, जनु अलि-पंक्ति अपार।",
            "मोर मुकुट सिर पेच विराजै, मृगमद-तिलक भाल छवि छाजै।",
            "गुंजमाल धारे, पीतपट वारे, पग अरुणारे, मृदु नूपुर झनकार।",
            "बेसर सुघर नासिका सोहै, लाल अधर लाली मन मोहै।",
            "ओ वंशीवारे, जन रखवारे, काहे बिसारे, ओर 'कृपालु' निहार ।।"
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            "लतन में ठाढ़ीं भानुदुलार।",
            "मणिन-अलंकृत कनक मुकुट सिर, लर मोतिन शृंगार ।",
            "अति कारी एँड़ी लौं वेणी, अनियारी घुँघरार।",
            "कानन करणफूल मणि मंडित, बिंदी अति अरुणार।",
            "दृग रस भरे सहज कजरारे, मतवारे रतनार।",
            "झलमलात मुक्ताहल नासा, नथ बेसर छबिदार।",
            "मंद मंद मुसकानि दशन दुति, चंद्र लजावनि हार ।",
            "उर कंचुकि लर हार मोतियन, नीलांबर रिझवार।",
            "कनकन कर कंकन, कटि किंकिनि, नूपुर धुनि झनकार।",
            "लाल मिहावरि लाल ओढ़नी, लालहिं मेहँदी सार।",
            "लखि 'कृपालु' शृंगार किशोरिहिं, भाल दिठौना डार ॥"
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          "text": "पद संख्या 3.119, सिद्धांत माधुरी"
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          "lines": [
            "सुनो मन! यह अनन्य की रीत।",
            "गौर श्याम-प्रिय परिजन तजि कहुँ, करत न सपनेहुँ प्रीत।",
            "भुक्ति मुक्ति बैकुण्ठ आदि सों, रहत अतीत अजीत।",
            "रसिकनि तजि श्री महाविष्णु को, करत न भूलेहुँ मीत।",
            "विधि निषेध अरु लोक वेद की, रहत न नेकहुँ भीत।",
            "रह प्रति रोम 'कृपालु' गौर-हरि, अरु हरिजन परतीत ॥"
          ]
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          "text": "पद संख्या 4.41, दैन्य माधुरी"
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          "lines": [
            "दयामय! अपनी ओर निहारो।",
            "हौं तो कुटिल कुपूत सदा को, तुम निज विरद विचारो।",
            "शिला अहिल्या, पशु वानर, गुह, श्वपच आदि उर धारो।",
            "मम हिय कुलिश, पतितमति पशु ते, कर्म श्वपच शत वारो।",
            "इक गुन रीझत गुनगाहक! इन, हमरे गुनन पसारो।",
            "जो कह साधन-बल मम पद गहु, नहिं त्रिकाल निस्तारो।",
            "हम 'कृपालु' उन प्रभु को चेरो, जो बिनु हेतु हमारो ॥"
          ]
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      "heading": "हरि-गुरु पर बलिहार | भक्ति चैलेंज 74",
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          "text": "पद संख्या 1.1, सद्गुरु माधुरी"
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            "अस रस महँ, मोहिं सद्गुरु बोरी।",
            "धर्म अर्थ अरु काम मोक्ष रस, सबै लगत मो फीको री।",
            "कहँ लौं कह बैकुण्ठ-लोकहूँ, रुचि नहिं टुक सपनेहुँ मोरी।",
            "इक भावत चंचल नँदनंदन, इक वृषभानुलली भोरी।",
            "गिरिजा-अजा जलधिजा-दुर्लभ, पियत रास रस ब्रजखोरी।",
            "कह 'कृपालु' अस सद्गुरु ऋण ते, उऋण न कोटि कल्प को री ॥"
          ]
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            "बलि जाउँ, युगल सरकार की।",
            "इतै रवति सुर मधुर-मुरलिका, नागर नंदकुमार की।",
            "उत ते आईं भानुनंदिनी, जनु मूरति शृंगार की।",
            "कुंज कुटीर तीर कालिंदी, मिलनि दुहुँन दृग-चार की।",
            "लखहु द्वैत-अद्वैत मधुरिमा, युगल-माधुरी-प्यार की।",
            "यह 'कृपालु' भी चहत बूँद इक, प्रेम-पयोधि अपार की ॥"
          ]
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      "heading": "हरि-गुरु से ही प्रेम | भक्ति चैलेंज 75",
      "title": "हरि-गुरु से ही प्रेम",
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          "text": "पद संख्या 3.55, सिद्धांत माधुरी"
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          "lines": [
            "तू मन! मनमानी त्याग रे।",
            "बीते जनम अनंत नींद महँ, अब झटपट उठ जाग रे।",
            "पुत्र कलत्र मित्र आदिक जे, तिन करु द्वेष न राग रे।",
            "नँदनंदन पादारविंद ते, करि ले अब अनुराग रे।",
            "तजि दे इंद्रिन विषय वासना, प्रेम सरस रस पाग रे।",
            "जो 'कृपालु' चह भुक्ति मुक्ति तो, लगे प्रेम पट दाग रे॥"
          ]
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          "text": "पद संख्या 9.4, श्री कृष्ण माधुरी"
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          "lines": [
            "कहुँ देखे आली, ललित त्रिभंगी लाल।",
            "जेहि सिर सोहति मोर चंद्रिका, लोचन कमल विशाल।",
            "भृकुटी कुटिल कनक श्रुति कुंडल, मृगमद तिलक सुभाल।",
            "उर फहरत पट पीत मनोहर, गल विलसत वनमाल।",
            "युगल पाणि मणिमय कंकण कटि, किंकिणि शब्द रसाल।",
            "झूमत चलत बजत पग पायल, लजवत राज मराल।",
            "मृदु मुसकाय बजाय मुरलि-धुनि, मोहत सब ब्रजबाल।",
            "सो 'कृपालु' मम जीवनधन पिय, नँदनंदन गोपाल॥"
          ]
        }
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      "heading": "श्री राधा महिमा | भक्ति चैलेंज 76",
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          "text": "पद संख्या 20.16, रसिया माधुरी"
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            "लखि रस-बरसानो बरसानो, कोटिन ब्रह्मानंद लजाय।",
            "महाभावरूपिणि श्री राधे।",
            "प्रेम-सुधा-निधि, रूप-अगाधे।",
            "पूरण-ब्रह्म जाहि आराधे।",
            "श्री वृषभानुभूप घर प्रकटीं, प्रेम-दान हित आय।",
            "जेहि, 'अज अलख' निगम नित गायो।",
            "सो ब्रज, नंद-गोप घर जायो।",
            "जेहि विधि, हरि हर खोजि न पायो।",
            "सोऊ ब्रह्म, स्वामिनिहिं खोजत, गहवर गलियन माय।",
            "पीरी-पोखर, प्रेम-सरोवर।",
            "लता-कुंज-गहवर, भानूखर।"
          ]
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          "lines": [
            "मालिनि, योगिनि रूप विविध धर।",
            "ब्रह्म रिझावत, निज स्वामिनि को, उर आनँद न समाय।",
            "'हा हा' खात, निहोरत सखियन।",
            "नेकु दिखाउ ललिहिं इन अँखियन ।",
            "मधु पिलावु छवि दृग मधु-मखियन।",
            "ललितहिं चरण पलोटत लखि लखि, लाल नैन ललचाय।",
            "राधा-रंग महल के माहीं।",
            "रज झारत निज मुकुट सदा हीं।",
            "कृपा मनावतहूँ डरपाहीं।",
            "नित 'कृपालु' मानिनिहिं मनावत, ब्रह्म दृगन झरि लाय॥"
          ]
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          "text": "पद संख्या 4.2, दैन्य माधुरी"
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            "अपनी ओर टुक हेरो री, किशोरी राधे।",
            "हौं तो कुटिल नीच सब दिन को,",
            "विश्व विदित अघ मेरो री किशोरी राधे!",
            "पै 'बिनु हेतु पतितपावनि' यह,",
            "विरद दुर्यो कित तेरो री किशोरी राधे!",
            "शिशु नवजात न जानत मातहिँ,",
            "रहत मातु रुचि चेरो री किशोरी राधे!",
            "त्यों हौं अति अबोध जड़ पामर,",
            "महामोह तम घेरो री किशोरी राधे!",
            "हमरिहिं बेर बेर कत एतिक,",
            "याको करिय निबेरो री किशोरी राधे!",
            "जगहुँ सुनात 'कृपालु' कुमात न,",
            "यदपि कुपूत घनेरो री किशोरी राधे!"
          ]
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          "text": "पद संख्या 15.25, मिलन माधुरी"
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          "lines": [
            "तुम जीवन-जीवन जीवनधन।",
            "तिन जीवन जीवन बस जीवन,",
            "जिन जीवन, किय जीवन अरपन।",
            "जिन किय निज कहँ अरपन तिन कहँ,",
            "अरपन कर निज कहँ यह तव पन।",
            "तिन दिय भार डारि तोहिं शिशु जनु,",
            "तुम सँभार जननी जनु छन छन।",
            "तिनके अवगुन गिनत न अगनित,",
            "अगनित करि तिन कहँ इक गुन गन।",
            "कह 'कृपालु' पुनि ते जिन जन जन,",
            "तिन मानत निज जन महँ प्रिय-जन।।"
          ]
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          "text": "पद संख्या 3.73, सिद्धांत माधुरी"
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          "lines": [
            "मन! क्यों नहिं हरि गुन गा रहा।",
            "यह जग है इक भूलभुलैया, क्यों तू धोखा खा रहा।",
            "भुक्ति मुक्ति हैं प्रबल पिशाचिनि, क्यों इनमें भरमा रहा।",
            "सुत वित नारिन त्रिविध तिजारिन, क्योँ इनको अपना रहा।",
            "इन इंद्रिन विषयन-विष पी मन, क्यों इतनो हरषा रहा।",
            "नर तनु पाय ‘कृपालु' भजन करु, यह जीवन अब जा रहा।।"
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            "अहो हरि! हरो विषम भव भीर।",
            "देहु भीख निष्काम प्रेम की, आयो द्वार अधीर।",
            "लख चौरासी योनि भ्रम्यों मैं, धरि धरि अमित शरीर।",
            "मिटी न प्यास पियत निशिवासर, मृग मरीचिका नीर।",
            "काम क्रोध मद बहुत सतायो, सहि न जात अब पीर ।",
            "विरद विचारि ‘कृपालु' आपुनो, जनि बनिये बेपीर ॥"
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            "नाथ सब अहइ तिहारेइ हाथ।",
            "काम क्रोध मद लोभ मोह मोहिँ, बहुत सतायो नाथ।",
            "इंद्रिय-मन-बुधि सबै देत नित, माया को ही साथ।",
            "तव माया अति प्रबल नचावति, मो कहँ जानि अनाथ।",
            "जब लौं धरहु न हाथ आपनो, नाथ हमारे माथ।",
            "तब लौं हौं 'कृपालु' नहिं ह्वै हौं, दीनानाथ! सनाथ॥"
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            "कहौं का, तुम सों नंदकुमार।",
            "वासोँ कहत फबत जो उर की, नहिं जानत सरकार।",
            "खरे खरे को तो संसारहुँ, सबै निबाहनहार।",
            "पै मो सम खोटे को तो प्रभु, इक तुम्हरो दरबार।",
            "यद्यपि क्षमायाचनाहूँ को, नहिं हमरो अधिकार।",
            "तदपि 'कृपालु' कहौं पुनि कासों, को पतितन रखवार॥"
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