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      "title": "देह की क्षणभंगुरता",
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            "तन यौवन धन दिन चार रे।",
            "बड़े बड़े सुंदर तनु वारे, अंत भये जरि छार रे।",
            "बड़े बड़े यौवन मद वारे, अंत खाँय लठ मार रे।",
            "बड़े बड़े अगनित धन वारे, अंत चलत सब झार रे।",
            "बड़े बड़े जे रहे कहावत, नाम न तिन संसार रे।",
            "ताते अब 'कृपालु' बनि छोटे, भजु नित नंदकुमार रे॥"
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            "ऊधो!, कहियो हरि समुझाय।",
            "हम सब उनहिं न कबहुँ बिसरिहैं, वे चाहे बिसराय।",
            "वे मेरे प्रियतम, प्राणेश्वर, हम अबला असहाय।",
            "हम सब भईं सनातन चेरी, वे चाहे ठुकराय।",
            "चितवत पंथ रैन-दिन देइहौं, अगनित जनम बिताय।",
            "पै ‘कृपालु' को भय पिय! जग सों, तव परतीति न जाय ॥"
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      "heading": "किशोरी जी से कृपा याचना | भक्ति चैलेंज 62",
      "title": "किशोरी जी से कृपा याचना",
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          "text": "पद संख्या 4.51, दैन्य-माधुरी"
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            "द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे !",
            "मांगत भीख प्रेम की यद्यपि, पात्र संग नहिं लायो री किशोरी राधे !",
            "विष्ठा-विषय हेतु नित अब लौं, शूकर ज्यों भटकायो री किशोरी राधे !",
            "संतन कह्यो नेकु नहिं मान्यो, कियो सदा मनभायो री किशोरी राधे !",
            "जानि जानि अपराध करत नित, नेकहुँ नाहिँ लजायो री किशोरी राधे !",
            "नर तनु हरि हरिजन अनुकंपा, सब ही पाय गँमायो री किशोरी राधे !",
            "तुम बिनु हेतु कृपालु ‘कृपालुहिं', पुनि काहे बिसरायो री किशोरी राधे !  ."
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          "text": "पद संख्या 4.78, दैन्य-माधुरी"
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            "मोहिं स्वामिनि! अब अपनाइये।",
            "श्री बरसाने धाम आपुने, मोहूँ काहिं बसाइये।",
            "पलक पाँवड़े पंथ बिछाऊँ, जब जाइय या आइये।",
            "देउँ बुहारी रास मँडल महँ, रास करन जहँ जाइये।",
            "आवन देउँ न मदन मोहनहुँ, जब मानिनि पद पाइये।",
            "अपनिहिं दासिहिं मानि 'कृपालुहिं' बारेक मोहिं बुलाइये।।"
          ]
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      "heading": "स्वयं को पापी मानो | भक्ति चैलेंज 63",
      "title": "स्वयं को पापी मानो",
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          "text": "सिद्धांत माधुरी, पद संख्या 77"
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          "lines": [
            "मिलत नहिं नर तनु बारम्बार।",
            "कबहुँक करि करुणा करुणाकर, दे नृदेह संसार।",
            "उलटो टाँगि बाँधि मुख गर्भहिं, समुझायेहु जग सार।",
            "दीन ज्ञान जब कीन प्रतिज्ञा, भजिहौं नंदकुमार।",
            "भूलि गयो सो दशा भई पुनि, ज्यों रहि गर्भ मझार।",
            "यह 'कृपालु' नर तनु सुरदुर्लभ, सुमिरु श्याम सरकार ।।"
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          "text": "दैन्य माधुरी, पद संख्या 16"
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            "अहो हरि! हौं पातक अवतार।",
            "लटकत तव तनु रोम रोम प्रति, ज्यों ब्रह्माण्ड अपार।",
            "त्यों हमरेहुँ शत कोटि अजामिल, रह प्रति रोम मझार।",
            "तुम तुम्हरे जन कोटि यतन करि, हारे बार हजार।",
            "पै हौं कियो सदा मनभायो, अंध बधिर अनुहार ।",
            "मम पातक दावानल सों अब, जरन चहत संसार।",
            "यासों अब 'कृपालु' कछु सोचिय, याको द्रुत उपचार॥"
          ]
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      "heading": "बिगड़ी बना दो राधे | भक्ति चैलेंज 64",
      "title": "बिगड़ी बना दो राधे",
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          "text": "पद संख्या 4.35, दैन्य-माधुरी"
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          "lines": [
            "किशोरी मोरी, बिगरी देहु बनाय।",
            "अति कोमल सुभाउ माँ तुम्हरो, वेद पुरानन गाय।",
            "कासोँ कहूँ सुने को तुम बिनु? मुझ दुखिया की माय।",
            "मोरी दशा भली तुम जानत, कबहुँ न अघन अघाय।",
            "कपटी कुटिल कुपूत रावरो, इत उत ठोकर खाय।",
            "भक्तिभाव कछु जानत नाहीँ, बनत रसिक-रस-राय।",
            "अपनी ओर निहारि राधिके!, अब तो लेहु अपनाय।",
            "मोहन सों इक बार मिला दो, परूँ तिहारे पाय।",
            "तुम्हरो माय! कहाय पूत अब, काके द्वारे जाय।",
            "यह 'कृपालु' हठ पुरवहु राधे!, न तु सुत मातु लजाय॥"
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      "heading": "दास का धर्म | भक्ति चैलेंज 65",
      "title": "दास का धर्म",
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          "text": "पद संख्या 3.63, सिद्धांत माधुरी"
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          "lines": [
            "पिय मोल अमोलक लीजिये।",
            "अस अवसर फिर नाहिँ मिलैगो, बातन मोर पतीजिये।",
            "बनन चहत जो अमर-सुहागिनि, तन-मन-प्रानन दीजिये।",
            "दै सरबस लै प्रेम-सुधा-रस, तेहि रस महँ नित भीजिये।",
            "पुनि तेहि रसहिं पिवाइय औरहिं, आपुहुँ सोइ रस पीजिये।",
            "जनम 'कृपालु' सफल कर लीजिय, क्यों कर? निज कर मीजिये॥"
          ]
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          "text": "पद संख्या 4.56, दैन्य माधुरी"
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          "lines": [
            "नाथ! मोहिं कीजै दासन दास।",
            "तिनको दरस परस नित पावूँ, छिन छिन को सहवास।",
            "तन मन धन सों सदा एक रस, सेऊँ सहित हुलास।",
            "सुनत करत सतसंग अनवरत, जग सों रहूँ उदास।",
            "निर्भय रहूँ कृपा ते तिन की, लहूँ प्रेम सुख रास।",
            "माँगत भीख 'कृपालु' कृपा करि, पुरवहु मम अभिलास॥"
          ]
        }
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      "heading": "निष्काम प्रेम की अभिलाषा | भक्ति चैलेंज 66",
      "title": "निष्काम प्रेम की अभिलाषा",
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          "lines": [
            "जगद्गुरूत्तम उपाधि",
            "श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावारीण, वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य, निखिलदर्शनसमन्वयाचार्य, सनातनवैदिकधर्मप्रतिष्ठापनसत्संप्रदायपरमाचार्य, भक्तियोगरसावतार, भगवदनन्तश्रीविभूषित, जगद्गुरु 1008 स्वामि श्री कृपालु जी महाराज"
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          "lines": [
            "दैनिक प्रार्थना",
            "श्री गुरवे नमः श्री गुरवे नमः श्री गुरवे नमः",
            "आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।",
            "न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः ॥",
            "हे परम प्रियतम पूर्णतम पुरुषोत्तम श्री कृष्ण! तुम से विमुख होने के कारण अनादिकाल से हमने अनन्तानन्त दुःख पाये एवं पा रहे हैं। पाप करते करते अन्तःकरण इतना मलिन हो चुका है कि रसिकों द्वारा यह जानने पर भी कि तुम अपनी भुजाओं को पसारे अपनी वात्सल्यमयी-दृष्टि से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हो, तुम्हारी शरण में नहीं आ पाता। हे अशरण शरण! तुम्हारी कृपा के बिना तुम्हें कोई जान भी तो नहीं सकता। ऐसी स्थिति में, हे अकारण करुण! पतितपावन श्रीकृष्ण! तुम अपनी अहैतुकी कृपा से ही हमको अपना लो। हे करुणा सागर! हम भुक्ति मुक्ति आदि कुछ नहीं माँगते, हमें तो केवल तुम्हारे निष्काम प्रेम की ही एकमात्र चाह है। हे नाथ! अपने विरद की ओर देखकर इस अधम को निराश न करो।",
            "हे जीवनधन! अब बहुत हो चुका, अब तो तुम्हारे प्रेम के बिना यह जीवन मृत्यु से भी अधिक भयानक है। अतएव, प्रेम भिक्षां देहि, प्रेम भिक्षां देहि, प्रेम भिक्षां देहि।",
            "साकेत बिहारी श्री राघवेन्द्र सरकार की जय।",
            "वृन्दावन बिहारी श्री यादवेन्द्र सरकार की जय।",
            "श्रीमद्सद्गुरु सरकार की जय।",
            "जय जय श्रीराधे! जय जय श्रीराधे! जय जय श्रीराधे!"
          ]
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          "text": "पद संख्या 4.92, दैन्य माधुरी"
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          "lines": [
            "हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे।",
            "यद्यपि भलीभांति हौं जानत, तुम बिनु हितू न मेरो री किशोरी राधे।",
            "तदपि रसिक जन कही न मानत, रहत विषय को चेरो री किशोरी राधे।",
            "परनिंदा परदोष कथन में, चतुर विचित्र चितेरो री किशोरी राधे।",
            "करत नाम अपराध निरंतर, हिय हंकार घनेरो री किशोरी राधे।",
            "बात बनावत ब्रज रसिकन की, मन कामादि बसेरो री किशोरी राधे।",
            "नाम ‘कृपालु' काम तुम जानति, भलो बुरो जस तेरो री किशोरी राधे॥"
          ]
        }
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      "heading": "विरहयुक्त पुकार | भक्ति चैलेंज 67",
      "title": "विरहयुक्त पुकार",
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          "text": "पद संख्या 21.10, प्रकीर्ण माधुरी"
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          "type": "verse",
          "lines": [
            "नन्दलाल प्यारे, यशुदा-दुलारे, नैनों के तारे, करूँ तिहारी मनुहार।",
            "प्रेम-पिपासा लेकर आई, सुघर सलोनी छवि मन में समाई।",
            "ना तप जानूँ, ना जप जानूँ, ना पहिचानूँ, केवल आस तिहार।",
            "आशा का बंधन टूट न जाये, लगन मिलन की छूट न जाये।",
            "ओ गिरिधारी! ओ बनवारी! कृष्णमुरारी! सुनि लेउ दीन पुकार।",
            "तुम बिनु पल छिन कल न परत है, विकल नैन दिन रैन झरत है।",
            "श्याम-सलोना, करि गयो टोना, दै गयो रोना, बाजी गई मैं हार।",
            "कैसे तुम बिनु हाय! रहूँ मैं, कैसे विरह बलाय सहूँ मैं।",
            "श्याम बेदरदी, कैसी कर दी, ऐसी कदर की, जाये 'कृपालु' बलिहार।।"
          ]
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      "heading": "अकारण करुणा की प्रार्थना | भक्ति चैलेंज 68",
      "title": "अकारण करुणा की प्रार्थना",
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          "text": "पद संख्या 4.91, दैन्य माधुरी"
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          "lines": [
            "सुनो हरि दीनन के रखवारI",
            "चर अरु अचर लक्ष चौरासी, जहँ लगि तव संसार।",
            "कौने द्वार भीख नहिं माँग्यों, जनमि जनमि बहु बार।",
            "कासों नहिं रोयो अपनो दुख, प्रति ब्रह्माण्ड मझार।",
            "तबहूँ प्रभु! मोहिं दीन न मानत, कौन न्याउ उर धार ।",
            "खोजत द्वार तिहारो निशि-दिन, ज्ञानीहूँ गये हार।",
            "पुनि हम मायाबद्ध जीव किमि, खोजि सकें तव द्वार।",
            "साधन बिनुहिं 'कृपालु' द्रवत तुम, याको करिय विचार ॥"
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      "heading": "प्रेम का स्वरूप | भक्ति चैलेंज 69",
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          "text": "पद संख्या 3.64, सिद्धांत माधुरी"
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            "प्राणधन जीवन कुंज बिहारी।",
            "तुम तो रहे सनातन हमरे, हौं हूँ रही तिहारी।",
            "उर लगाय भुज भरि हरि चाहे, पुरवहु आस हमारी।",
            "चाहे मोहिँ तड़पाउ मोरि मुख, पग ठुकराव मुरारी।",
            "जेहि विधि पिवु सुख पाउ करिय सोइ, मो कहँ सोइ सुख भारी।",
            "यह 'कृपालु' है रीति प्रीति की, निज सुख चह व्यापारी॥"
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            "अहो पिय! जब तुम्हरी बनि जैहौं।",
            "तव मुखचंद्र, चकोर पियत नित, दृगन न नेकु अघैहौं।",
            "ह्वै तुम्हरी अपनो करि तुम को, तन मन प्राण लुटैहौं।",
            "तव कर परस पाय मदमाती, फूली अँग न समैहौं।",
            "नचिहौं बनि उनमादिनि छिन छिन, तुम्हरोइ गुनगन गैहौं।",
            "मन भाई ‘कृपालु' करि भुज भरि, पुनि पुनि कंठ लगैहौं॥"
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          "text": "पद संख्या 3.111, सिद्धांत माधुरी"
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            "सदा सोँ सोई दुलहिनि जाग।",
            "आये रसिक जगावन आपुहिँ, जाग्यो तेरो भाग।",
            "भुज पसारि कब ते पिय परखत, वेगि धाइ उर लाग।",
            "बिनु पिय-परस न रतिरस पाइय, जरि जाइय कामाग।",
            "रति-रस-बस बरबस करि बस पिय, खेलु रास-रस फाग।",
            "अस 'कृपालु' संयोग बनै जो, होवे अमर सुहाग॥"
          ]
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          "text": "पद संख्या 18.22, होरी माधुरी"
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            "लाल सँग, खेलिय हिल मिल फाग।",
            "चलु री सखी! भव-निशा सिरानी, भई भोर गइ जाग।",
            "केशर घोर भाव की गोरी!, पिचकारी अनुराग।",
            "पानि तानि मारिय दृग-बानन, सहज पिया-रस-पाग।",
            "रति-रस-रँग-सरबोरी गोरी, लखु अपुनो बड़भाग।",
            "इमि 'कृपालु' करि उर-पट-बंदी, करु निज अमर सुहाग॥"
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