# तू ही गति तू ही मति तू ही रति राधे,

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-057
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 124–125



<a id="line-1"></a>तू ही गति तू ही मति तू ही रति राधे,  
<a id="line-2"></a>मो सो पतितन को न और ठौर राधे।  
<a id="line-3"></a>माता पिता भ्राता सुत तिय पति राधे,  
<a id="line-4"></a>बनते हितैषी पर स्वारथी हैँ राधे।  
<a id="line-5"></a>स्वार्थ बिनु कोउ काउ देखे भी न राधे,  
<a id="line-6"></a>बोलें सब मीठी बोल उर विष राधे।  
<a id="line-7"></a>सुनते हैं सात स्वर्ग लोक सुख राधे,  
<a id="line-8"></a>सोउ काल कर्म गुण आधीन राधे।  
<a id="line-9"></a>उनते भी आगे विधि हरि हर राधे,  
<a id="line-10"></a>वे भी तो हैं कृपा के भिखारी तेरे राधे।  
<a id="line-11"></a>उनके भी ऊपर महाविष्णु राधे,  
<a id="line-12"></a>वे भी महाविष्णु तेरी अंश कला राधे।  
<a id="line-13"></a>श्रुति कह सबते परे हैं ब्रह्म राधे,  
<a id="line-14"></a>जाको रूप निराकार साकार राधे।  
<a id="line-15"></a>साकार ब्रह्म को तो जानो तुम राधे,  
<a id="line-16"></a>तेरी चाकरी को तरसत नित राधे।

<a id="line-17"></a>उनते भी आगे तेरी ब्रज गोपी राधे,  
<a id="line-18"></a>तुम दोनों की “कृपालु” कृपा एक राधे।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-19"></a>भावार्थ—भक्त अपनी इष्टदेवी श्रीराधा से कहता है- हे श्रीराधे!  
<a id="line-20"></a>तुम ही तो मेरी एकमात्र गति हो, तुम ही मेरी बुद्धि प्रदात्री हो एवं  
<a id="line-21"></a>तुम ही मेरे प्रेम का आश्रय हो। राधे! मेरे जैसे पतित के लिये तुम्हें  
<a id="line-22"></a>छोड़कर और दूसरा कोई स्थान नहीं है। यद्यपि संसार में माता,  
<a id="line-23"></a>पिता, भाई, बन्धु, पुत्र एवं पति, पत्नी आदि के अनेक सम्बन्ध हैं।  
<a id="line-24"></a>ये सब प्रकट में तो हितैषी प्रतीत होते हैं किन्तु सबके हृदय में  
<a id="line-25"></a>स्वार्थ छिपा रहता है। बिना स्वार्थ के कोई किसी की ओर देखना  
<a id="line-26"></a>भी पसन्द नहीं करता। शिष्टाचार-वश सभी अत्यन्त मधुर वाणी  
<a id="line-27"></a>बोलते हैं परन्तु हृदय में सभी के विष घुला हुआ है। सुनने में आता  
<a id="line-28"></a>है कि सात स्वर्ग लोक सुख से परिपूर्ण हैं। परन्तु वे लोक काल,  
<a id="line-29"></a>कर्म एवं गुणों पर निर्भर हैं। अर्थात् स्वर्ग लोक का सुख क्षणिक  
<a id="line-30"></a>है। शुभ-कर्मों से ही प्राप्त होता है तथा वहाँ भी माया के तीन  
<a id="line-31"></a>गुण-सत्व, रज एवं तम विद्यमान हैं।स्वर्गहु स्वल्प अंत दुःखदायी।  
<a id="line-32"></a>स्वर्ग लोक से ऊपर ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के लोक हैं। वे भी  
<a id="line-33"></a>तुम्हारी कृपा पर ही निर्भर हैं। इन सबसे श्रेष्ठ महाविष्णु हैं, वे  
<a id="line-34"></a>महाविष्णु भी तुम्हारे अंश स्वरूप हैं। वेद के अनुसार सर्वोच्च पद  
<a id="line-35"></a>ब्रह्म का है, जिसके निराकार एवं साकार दो रूप हैं-साकार ब्रह्म  
<a id="line-36"></a>श्रीकृष्ण से तो तुम परिचित ही हो, वे तुम्हारी सेवा को सदा लालायित  
<a id="line-37"></a>रहते हैं। उन साकार ब्रह्म से भी उच्च स्थान तुम्हारी ब्रज गोपियोँ  
<a id="line-38"></a>का है। श्री कृपालुजी कहते हैं- ब्रजगोपियोँ की कृपा तुम्हारी ही  
<a id="line-39"></a>कृपा है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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