# बलिहार ब्रजेन्द्र कुमार, तव अस्तुति कर श्रुति चार।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-046
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 101–103



<a id="line-1"></a>बलिहार ब्रजेन्द्र कुमार, तव अस्तुति कर श्रुति चार।  
<a id="line-2"></a>मानी विधि हरि हर हार, तव महिमा अपरंपार॥  
<a id="line-3"></a>तू पूर्ण ब्रह्म साकार, तू चित सुख घन तन धार।  
<a id="line-4"></a>तू दिव्य प्रेम अवतार, तव महिमा अपरंपार॥  
<a id="line-5"></a>तू सब जग सर्जन हार, तू सब जग पालन हार।  
<a id="line-6"></a>तू ही कर जग संहार, तव महिमा अपरंपार॥  
<a id="line-7"></a>तू त्रिभुवन मोहन हार, तू मदनहुँ मोहन हार।  
<a id="line-8"></a>तू निज मन मोहन हार, तव महिमा अपरंपार॥  
<a id="line-9"></a>तू दीनन को रखवार, तू पतितन की पतवार।  
<a id="line-10"></a>तू निराधार आधार, तव महिमा अपरंपार॥

<a id="line-11"></a>तू भक्त वश्य सरकार, तू व्यापक जगत मझार।  
<a id="line-12"></a>तू अग जग प्राणाधार, तव महिमा अपरंपार॥  
<a id="line-13"></a>तू प्रेम सुधा रस सार, तू करुणा को भंडार।  
<a id="line-14"></a>तू ब्रज वनितनि रिझवार, तव महिमा अपरंपार॥  
<a id="line-15"></a>तू शरणागत रखवार, तू सब उर जाननि हार।  
<a id="line-16"></a>तू ब्रज रस सिंधु अपार, तू ही “कृपालु” सरकार॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-17"></a>भावार्थ—भक्त अपने इष्ट पर बलिहार जाते हुए कहता है-हे  
<a id="line-18"></a>ब्रजराज कुमार! चारों वेद तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुमसे सृष्टि  
<a id="line-19"></a>कर्ता ब्रह्मा, सृष्टि का पालन करने वाले विष्णु एवं सृष्टिसंहार  
<a id="line-20"></a>करने वाले शिव भी पराजय स्वीकार करते हैं। तुम परिपूर्णतम  
<a id="line-21"></a>साकार ब्रह्म हो। तुम चिदानन्दमय हो। तुम्हारा शरीर सुख-समूह-  
<a id="line-22"></a>स्वरूप है।  
<a id="line-23"></a>चिदानन्दमय देह तुम्हारी।  
<a id="line-24"></a>तुम दिव्य प्रेम के ही अवतार हो। तुम्हारी महिमा अवर्णनीय  
<a id="line-25"></a>है। तुम अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों की रचना करने वाले हो। तुम से  
<a id="line-26"></a>ही सम्पूर्ण सृष्टि का पालन होता है। जगत् के संहारकर्ता भी एकमात्र  
<a id="line-27"></a>तुम ही हो। तुम्हारी महिमा अतुलनीय है। तुम अपनी अलौकिक  
<a id="line-28"></a>रूप-माधुरी से त्रिभुवन को भी मोहित कर लेते हो। जगत् को  
<a id="line-29"></a>मोहित करने वाले कामदेव को भी अपने रूप-लावण्य से तुमने  
<a id="line-30"></a>मोहित कर लिया। आश्चर्य तो यह है कि अपने रूप को दर्पण में  
<a id="line-31"></a>निहारकर तुम स्वयं भी मोहित हो जाते हो। हे श्रीकृष्ण! दीनों के  
<a id="line-32"></a>रक्षक तो एकमात्र तुम ही हो। पतितजनों को भव-सिन्धु से पार

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-33"></a>करने के लिये तुम पतवार-स्वरूप हो। निराधारों के आधार एकमात्र  
<a id="line-34"></a>तुम ही हो। तुम्हारी महिमा का पार किसी ने भी नहीं पाया-  
<a id="line-35"></a>नारद से शुक व्यास रटें पचि हारे तऊ पुनि पार न पायो।  
<a id="line-36"></a>हे नाथ! आप सदा ही अपने भक्तों के वश में रहते हो। तुम  
<a id="line-37"></a>संसार में सर्वत्र व्यापक हो। तुम जड़-चेतन सभी के प्राणों के  
<a id="line-38"></a>अवलम्ब हो। तुम्हारी महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ हो  
<a id="line-39"></a>सकता है? तुम प्रेमामृत के सार स्वरूप हो। अगणित दिव्य गुणों  
<a id="line-40"></a>से मंडित होकर भी तुम्हारा हृदय करुणा से परिपूर्ण है। हे श्रीकृष्ण!  
<a id="line-41"></a>तुम ब्रजयुवतियों को आनन्द प्रदान करने वाले हो। तुम्हारी महिमा  
<a id="line-42"></a>का गायन करने में सभी असमर्थ हैं। हे नाथ! तुम अपने चरणों का  
<a id="line-43"></a>आश्रय लेने वाले शरणागत भक्तों की रक्षा करने में सदैव तत्पर  
<a id="line-44"></a>रहते हो। तुम सर्वान्तर्यामी हो। श्री कृपालुजी कहते हैं कि हे श्री  
<a id="line-45"></a>कृष्ण तुम ही ब्रज-रस के अपार समुद्र हो। तुम ही हमारे स्वामी  
<a id="line-46"></a>हो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
