# तुम मम प्रियतम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-009
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 32–34



<a id="line-1"></a>तुम मम प्रियतम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-2"></a>हौँ कान्हा अब लौँ नहिँ जाना,  
<a id="line-3"></a>रहेउ विमुख तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-4"></a>तप्यो त्रितापन पापन कान्हा,  
<a id="line-5"></a>पायो जग दुख नाना, कान्हा कान्हा कान्हा।

<a id="line-6"></a>बाँध्यो आपु आपु कहँ कान्हा,  
<a id="line-7"></a>मकड़ी जाल समाना, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-8"></a>भोग्यो लख चौरासी कान्हा,  
<a id="line-9"></a>योनि जनमि दुख नाना, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-10"></a>रसिक जनायेहु तब मैं जाना,  
<a id="line-11"></a>मैं हूँ आत्मा कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-12"></a>आत्मा की आत्मा तू कान्हा  
<a id="line-13"></a>यह भी अब मैं जाना, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-14"></a>अब तो गह्यो शरण तव कान्हा,  
<a id="line-15"></a>जग मृग जल ज्यों जाना, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-16"></a>अब लौं किय मनमाना कान्हा,  
<a id="line-17"></a>अब माना मन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-18"></a>तत्व “कृपालु” सार यह जाना,  
<a id="line-19"></a>छिन छिन भजु मन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-20"></a>भावार्थ—भक्त अपने इष्ट श्रीकृष्ण से कहता है-हे मेरे प्राण  
<a id="line-21"></a>स्वरूप कृष्ण! अब मैं जान गया कि तुम ही मेरे वास्तविक प्रियतम  
<a id="line-22"></a>हो। अभी तक तुमसे विमुख रहने के कारण माया से मैं स्वयं को  
<a id="line-23"></a>शरीर समझता रहा, अतः तुम्हारा मुझसे क्या सम्बन्ध है, यह मैं  
<a id="line-24"></a>नहीं जान सका। तुम्हारी सन्मुखता न रहने से मैं पाप करता रहा,  
<a id="line-25"></a>परिणामस्वरूप दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से तपते हुए संसार  
<a id="line-26"></a>में मैंने भाँति-भाँति के दुःख भोगे। अपने कर्म जाल में मैंने स्वयं ही  
<a id="line-27"></a>स्वयं को फँसा लिया, जिस प्रकार मकड़ी अपने मुख से ही जाला  
<a id="line-28"></a>बनाकर इसी में स्वयं फँस जाती है। माया से भ्रमित हुआ मैं चौरासी

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-29"></a>लाख योनियों में भटकता रहा। जब मुझे तुम्हारे प्रेमी भक्तों का संग  
<a id="line-30"></a>प्राप्त हुआ तब यह रहस्य मेरी समझ में आया कि मैं शरीर नहीं हूँ,  
<a id="line-31"></a>तुम्हारा अंश, आत्मा हूँ। मुझ आत्मा की भी आत्मा एकमात्र तुम्हीं  
<a id="line-32"></a>हो यह अब मेरी समझ में आया है। जब मैंने स्वयं को आत्मा  
<a id="line-33"></a>स्वीकार किया तब तुम्हारी शरण में आया हूँ। अब स्पष्ट प्रतीत  
<a id="line-34"></a>होता है कि जगत् के सुख मृग-जल के समान ही मिथ्या है।  
<a id="line-35"></a>अज्ञानवश अभी तक तुम्हारे सन्मुख न होने के कारण मैं मनमानी  
<a id="line-36"></a>करता रहा परन्तु अब तो मेरा मन तुम्हारे चरणों में आ गया, अतः  
<a id="line-37"></a>कृपालुजी कहते हैं- जीवन का सार मेरी समझ में आ गया, वह  
<a id="line-38"></a>यह कि मन से प्रतिक्षण तुम्हारा स्मरण, भजन ही करना है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
