# जीवनधन नंदकुमार, तन मन धन प्रानन वार।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-008
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 31–32



<a id="line-1"></a>जीवनधन नंदकुमार, तन मन धन प्रानन वार।  
<a id="line-2"></a>कह वेदहु नेति पुकार, सोई है मम भरतार॥  
<a id="line-3"></a>आनँद घन तन सरकार, बह रोम रोम रस धार।  
<a id="line-4"></a>लखि कोटि काम दउँ वार, सोई है मम भरतार॥  
<a id="line-5"></a>जो मोर मुकुट सिर धार, जेहि कारी लट घुँघरार।  
<a id="line-6"></a>जेहि केशर तिलक लिलार, सोई है मम भरतार॥  
<a id="line-7"></a>जो कानन कुंडल धार, दृग कजरारे रतनार।  
<a id="line-8"></a>नासा बेसर छविदार, सोई है मम भरतार॥  
<a id="line-9"></a>जो उर कौस्तुभ मणि धार, पीतांबर छवि छविदार।  
<a id="line-10"></a>जो नटवर भेष सँवार, सोई है मम भरतार॥  
<a id="line-11"></a>जो कनकन कंकन धार, कटि काछनि छवि रिझवार।  
<a id="line-12"></a>जेहि पग नूपुर झनकार,सोई है मम भरतार॥  
<a id="line-13"></a>जो रूप सुधा रस सार,जो निराधार आधार।  
<a id="line-14"></a>ब्रजनार प्राण साकार,सोइ मम “कृपालु” भरतार॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-15"></a>भावार्थ—भक्त अपने इष्ट को सम्बोधन करता है-हे मेरे  
<a id="line-16"></a>जीवन-सर्वस्व रूप नंदनंदन! मैं तुम पर अपने तन, मन, धन एवं  
<a id="line-17"></a>प्राणों को न्यौछावर करता हूँ। जिस तत्व को वेद ने नेति नेति-न  
<a id="line-18"></a>इति, न इति कहकर पुकारा वही श्रीकृष्ण मेरे प्राणपति हैं। श्याम  
<a id="line-19"></a>सरकार का दिव्य शरीर आनन्दघन स्वरूप है। उस दिव्य तनु के  
<a id="line-20"></a>रोम-रोम से आनन्द-रस की धारा प्रवाहित होती रहती है। जिसके  
<a id="line-21"></a>रूप पर करोड़ों कामदेव का सौन्दर्य फीका पड़ जाता है, वही मेरे

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-22"></a>प्रियतम हैं। जिनके सिर पर मोर-मुकुट शोभायमान है, जिनके  
<a id="line-23"></a>मस्तक पर काली घुँघराली केशराशि क्रीड़ा कर रही है, जिनके  
<a id="line-24"></a>ललाट पर केसर का तिलक चमक रहा है, मेरे प्राणप्रिय वही हैं।  
<a id="line-25"></a>जिनके कर्ण-कुण्डलों से विभूषित हैं, अरुणिमा युक्त नेत्रों में काजल  
<a id="line-26"></a>सँवारा गया है, जिनकी नासिका में बेसर छवि पा रही है, वही  
<a id="line-27"></a>श्यामसुन्दर मेरे प्राणबल्लभ हैं। जिनका विशाल वक्षःस्थल कौस्तुभ  
<a id="line-28"></a>मणि से दैदीप्यमान है, अंग दिव्य छवि से युक्त पीताम्बर से  
<a id="line-29"></a>आच्छादित है, श्रेष्ठ नट के समान जिन्होंने वेशभूषा धारण की है,  
<a id="line-30"></a>वही मेरे प्राणधन हैं। जिनके कोमल करों में स्वर्ण कंकण धारण  
<a id="line-31"></a>कराये गये हैं, सूक्ष्म कटि प्रदेश पर काछनी कसी है जिनके चरण  
<a id="line-32"></a>प्रान्त नूपुरों की मधुर झनकार से युक्त हैं, वे ही मेरे प्राणपति हैं।  
<a id="line-33"></a>जिनका अलौकिक रूप मानो अमृत के भी सार तत्व से निर्मित है।  
<a id="line-34"></a>दिव्य रूप सुधा से युक्त होकर भी जो अपनी करुणा से निराधारों  
<a id="line-35"></a>के आधार स्वरूप हैं, जो ब्रजगोपियों के साकार प्राण स्वरूप ही हैं  
<a id="line-36"></a>वे ही कृपालु कृष्ण मुझ अकिंचन के भी प्राण स्वरूप हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
