# अपना बनाया तोहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-001
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 16–18



<a id="line-1"></a>अपना बनाया तोहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।  
<a id="line-2"></a>तू अपनी माने या कान्हा,  
<a id="line-3"></a>नहिं माने मोहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।  
<a id="line-4"></a>तू ही मेरा यह रह कान्हा,  
<a id="line-5"></a>भाव नित्य मम कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।  
<a id="line-6"></a>मैं तेरी यह भाव न कान्हा,  
<a id="line-7"></a>चह हौं सपनेहुँ कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।  
<a id="line-8"></a>ब्रह्मलोक तक के सुख कान्हा,  
<a id="line-9"></a>हौँ न चहौँ टुक कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।  
<a id="line-10"></a>भूलेहुँ मुक्तिहुँ चह नहिं कान्हा,  
<a id="line-11"></a>तुम न मिलहु तहँ कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।  
<a id="line-12"></a>बैकुंठहुँ सुख नहिं चह कान्हा,  
<a id="line-13"></a>तहँ ब्रज रस नहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।  
<a id="line-14"></a>मथुरा द्वारवतिहुँ रस कान्हा,  
<a id="line-15"></a>ब्रज रस सम नहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।  
<a id="line-16"></a>जब भी दो “कृपालु” मोहिं कान्हा,  
<a id="line-17"></a>ब्रज रस ही दो कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-18"></a>भावार्थ—भक्त अपनी आत्मा की आत्मा श्रीकृष्ण के प्रति  
<a id="line-19"></a>अपने हृदय के उद्गार प्रकट करते हुए कहता है- हे कन्हैया! मैं

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-20"></a>तो सदा-सदा के लिये तुम्हें अपना बना चुका हूँ। मैं तुमसे यह  
<a id="line-21"></a>आशा नहीं रखता कि तुम भी मुझे अपना बनाओ। “तुम ही मेरे  
<a id="line-22"></a>हो” (मधुस्नेह) मेरा यह भाव चिरस्थायी रहे। हे नंदनंदन! “मैं भी  
<a id="line-23"></a>तुम्हारा बनूँ” (घृत स्नेह) इस भाव को तो मैं स्वप्न में भी नहीं  
<a id="line-24"></a>चाहता। हे मेरे नाथ! मेरी तुमसे अनुनय है-तुम मुझे स्वप्न में भी  
<a id="line-25"></a>कभी सांसारिक सुख (ब्रह्मलोक पर्यन्त) प्रदान न करना। पुनरागति  
<a id="line-26"></a>होने के कारण इन लोकों के सुख से आत्मा संतुष्ट नहीं होती।  
<a id="line-27"></a>सांसारिक सुख जीव को तुमसे विमुख कर देते हैं। कुन्ती ने कहा  
<a id="line-28"></a>था—  
<a id="line-29"></a>विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो।  
<a id="line-30"></a>भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥  
<a id="line-31"></a>जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान्।  
<a id="line-32"></a>नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिंचन गोचरम्॥  
<a id="line-33"></a>हे श्यामसुन्दर! मैं मुक्ति का सुख भी नहीं चाहता, कारण-  
<a id="line-34"></a>मुक्ति में सेवक-सेव्य भाव ही समाप्त हो जाता है। बूँद समुद्र में  
<a id="line-35"></a>मिलकर समुद्र ही बन गई तब उस बूँद का पृथक् अस्तित्व ही  
<a id="line-36"></a>समाप्त हो गया। गोपियाँ कहती हैं-यद्यपि हम स्वीकार करती हैं  
<a id="line-37"></a>कि श्रीकृष्ण और ब्रह्म एक ही हैं परन्तु हमें अद्वैत प्रिय नहीं।  
<a id="line-38"></a>मान्यो हम कान्ह ब्रह्म एक,  
<a id="line-39"></a>तऊ हमें भावति न भावना अन्यारी की।  
<a id="line-40"></a>जइहैं बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि की,  
<a id="line-41"></a>बूँदता बिलैहै बूँद बिबस बिचारी की

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-42"></a>प्रेम का रसास्वादन द्वैत में ही सम्भव है। पुनः भक्त कहता है-  
<a id="line-43"></a>हे मेरे प्रेमधन! मुझे तो बैकुण्ठ का सुख भी प्रिय नहीं प्रतीत होता,  
<a id="line-44"></a>कारण- वहाँ लीला-सौरस्य का अभाव है। ब्रज-रस का आस्वादन  
<a id="line-45"></a>बैकुण्ठ-वासी नहीं कर सकते। द्वारिका एवं मथुरा के प्रिय-जन  
<a id="line-46"></a>भी ब्रजरस के प्रति उत्कंठित ही बने रहे।  
<a id="line-47"></a>सबै सरस रस द्वारिका, मथुरा अरु ब्रज माहिं।  
<a id="line-48"></a>मधुर, मधुरतर, मधुरतम, रस ब्रज रस सम नाहिं॥  
<a id="line-49"></a>[भक्ति शतक]  
<a id="line-50"></a>कृपालुजी कहते हैं अतः हे ब्रजेन्द्र कुमार! हमें तो ब्रजरस की  
<a id="line-51"></a>ही लालसा है। तुम अपनी इच्छानुसार जब भी कृपा करो तब हमें  
<a id="line-52"></a>ब्रजरस ही प्रदान करना।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
